⭕️ टिल्लू शर्मा ✒️ टूटी कलम रायगढ़ …… 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है एवं लोगो के द्वारा जहां तहां वृक्षारोपण करने की बातें कही जाती है। एक पौधे का रोपण करते समय का दर्जनों लोग फोटो खिंचवाकर अपने आप को पर्यावरण प्रेमी बतलाना चाहते है। वृक्षारोपण करने के पश्चात अगले दिन से लोग उस स्थल पर झांकना तक गंवारा नही समझते। जबकि पौधे के रोपण के पश्चात उसकी देखभाल पुत्रवत रूप से करनी पड़ती है। सर्वप्रथम पौधे को बाड़ लगाकर घेरा जाता हैं ताकि वे किसी चौपाये के भक्षण का कारण न बन सके। समय समय पर पानी देना पड़ता है ताकि वे प्रकाश संश्लेषण कर अपना भोजन बना सके। नियमित रूप से कटाई,छटाई, करनी पड़ती है। जिससे वे मनमाने आकार में न फैल सके। समय समय पर मिट्टी पलटी करनी पड़ती है ताकि मिट्टी नरम रह सके पत्थर के रूप में न बदल सके। कभी कभार किट नाशक भी डालनी पड़ती है जिससे कीड़े,मकोड़े चट न कर जाए। गोबर खाद,वर्मी कम्पोस्ट डालनी पड़ती है ताकि उनकी वृद्धि शीघ्र हो सके। इतना सब करने पर ही वृक्षारोपण की अहमियत होती है। जिससे बाद में पौधा वृक्ष का रूप धारण कर मनुष्यों को ऑक्सीजन,शीतलता,छांव,फल,फूल प्रदान करने लायक बन पाता है। टूटी कलम
हमारे देश मे नीम, पीपल,बरगद,आम,आंवला, हर्रा,आदि वृक्षो को पूजा जाता है। वही जामुन,आम,बेल,अमरूद,अनार,नारियल,केला,इमली, खजूर, आदि फलों को खाना बीमारी भगाना, पौष्टिकता,दुर्बलता नाशक माना जाता है। सागौन,शीशम,बीजा,नीलगिरी,कपास,गुलमोहर,आदि की इमारती लकड़ियां बहुउपयोगी होती है। यदि वास्तविक रूप से देखा जाए तो मनुष्य जीवन बगैर पेड़ के कुछ भी नही है क्योंकि मृत्यु के पश्चात बांस से निर्मित अर्थी बनती है एवँ दाह संस्कार पेड़ो की लकड़ियों में किया जाता है। इसका सीधा सा अर्थ है कि मनुष्य से वृक्ष किसी न किसी रूप में जुड़ा होता है। जीवन मे कभी एक पौधा न लगाने वाले इंसान को भी पेड़ की लकड़ियों की आगोश में शिवपथ गमन करना पड़ता है। टूटी कलम
वृक्षो की जड़े,डंगाल,पत्ते,फूल,फल,छाल, लकड़ी आदि इंसान के ही काम आते है। मगर वाह रे,मौकापरस्त, खुदगर्ज इंसान अपनी अर्थ लिप्सा के कारण हजारों वृक्षो की बलि लेने से भी नही चुकता। बहुत पहले एक कव्वाली आई थी। जिसे हर मनुष्य को जरूर सुनना चाहिए। इस कव्वाली में लकड़ी की महिमा बखूबी से बखान की गई है। ” चांद को छूने वाले इंसान देख तमाशा लकड़ी का टूटी कलम
दर्जनों हाथों को लगने से पौधे का दम घुटता है…सोशल मीडिया पर ऐसे लोगो की भी कमी नही है। जो स्वयं को पर्यावरण मित्र बतलाते हुए एक पौधे के रोपण के समय दर्जनों लोग उसे छूटे है। अब पता नही की उनमें से किसका हाथ मनहूस होता है कि पौधा अपने बाल्यकाल में ही दम तोड़ देता है। हजारों वृक्षो की बलि चढ़ाने वाले कहते है। वृक्ष नही तो आक्सीजन नही,वृक्ष नही तो छांव नही,वृक्ष नही तो जीवन नही,एक वृक्ष की कीमत 17 लाख 60 हजार ₹ आंकी जाती है। उद्योग लगाने वाले,उद्योगो का विस्तार करना चाहने वालो से प्रति वृक्ष 17 लाख 60 हजार रुपये के हिसाब से सरकारी कोष में जमा करवाना चाहिए एवँ जितने पेड़ काटे जाने की चाह रखते हो उतने वृक्षो का रोपण एवँ 5 वर्ष तक कि देखरेख का अनुबंध किया जाना चाहिए। टूटी कलम