✒️ टिल्लू शर्मा रायगढ़…जहाँ विकाश होता है तहां विनास तय होता है,विनास के नाम पर विकाश की बुनियाद रखी जाती है परन्तु जब कोई रँगा सियार शेर का लबादा ओढ़कर शेर बनने का प्रयास करता है या फिर जब कोई इंसान अपने आपको समाजसेवी बतलाकर सेवा विरुद्ध कार्य करता है तो स्थिति काफी हास्यास्पद हो जाती है। लोगो की नजरों से समाजसेवा का नकाब उतर जाता है एवं उनकी नजरे साफ देखने मे सक्षम होती है। वैसे ही रायगढ़ की हवा बहुत ज्यादा प्रदूषित हो चुकी है। लोग तरह तरह की बीमारियों से ग्रषित हो रहे है। ग्रामीण क्षेत्रों की तालाबे,प्राकृतिक जल स्त्रोत अपना अस्तित्व खो चुके है।निस्तारी एवं पीने के पानी,पशुओं की चारागाह, इनके नहलाने धुलाने के साधन,पक्षीयो के घोसले पशुओं के जंगल गायब हो चुके है। जंगलो के स्थानों पर प्रदूषण फैलाते उद्योगों ने जगह ले ली है। “जय जवान जय किसान“ कृषि रकबा घटने लगा है। कोटवारी जमीनों,नजूल जमीनों,वन भूमियों पर रसूखदारों के कब्जे हो चुके है। फैक्ट्रियों से निकली डस्ट को नदी,नालो,तालाबो,सड़क किनारे,कृषि भूमि को बंजर बनाया जा रहा है।आदिवासियो की जमीने कौड़ियों के मोल खरीदकर नामांतरण किये जा रहे है। टूटी कलम
रायगढ़ पर्यावरण व औद्योगिक सुरक्षा विभाग के नाक नीचे उद्योग विभाग की शह पर निजी कंपनियां खुलेआम पर्यवारणीय नियमों का माखौल उड़ा रही है। गौरमुड़ी के सागौन के जंगलों के बीच स्थापित उद्योग एनआर इस्पात एंड पावर लिमिटेड जिसकी लोक सुनवाई 5 जनवरी को रखी गई है। इसके इंडक्शन फर्नेश की वर्तमान क्षमता 48 हजार टन प्रतिवर्ष है जिसे 7 लाख 8 हजार टन प्रतिवर्ष करने का कंपनी का प्रस्ताव है। ऐसा ही पावर प्लांट सेगमेंट में है जहां कंपनी वर्तमान में डब्ल्यूएचआरबी और एफबीसी मिलाकर 8 मेगावाट बिजली का उत्पादन करती है जो अब 58 मेगावाट के लिए विस्तार कर रही है। ऐसा कंपनी के हर क्षेत्र में बढ़ोत्तरी हो रही है। जिससे कंपनी के इर्द-गिर्द के गौरमुड़ी, देलारी, लाखा, गदगांव, सराईपाली, तराईमाल, तुमीडीह, गेरवानी, भुईकुर्री, सामारूमा गांव पूर्ण रूप से प्रभावित होंगे। इन ग्रामो के आसपास इमारती वन हैं। इसको वन विभाग ने ही रोपित किया था। बाद में इन वनों का विस्तार होता गया। एक अनुमान के मुताबिक लाखों सागौन, साल,सरई और बीजा जैसे पेड़ लगे है। अगर कंपनी क्षमता विस्तार करेगी तो उक्त वन प्रभावित होगा ही। इसमें से काफी संख्या में पेड़ो की बलि चढ़ेगी। टूटी कलम
वैसे तो देखा जाए तो उद्योगों के नाम पर कटने वाले पेड़ो की क्षतिपूर्ति के लिए शासन क्षतिपूर्ति पौधरोपण कराने की बात कहती है लेकिन इसमें किसप्रकार खानापूर्ती होती है यह किसी से छिपा नही है। इमारती पेड़ो की बाली के बाद भी यही स्थिति सामने आएगी।








