✒️ टिल्लू शर्मा टूटी कलम रायगढ़….. सरकार प्रकृति प्रदत्त रेत पर जबरन राजनीति कर रही है। जबकि रेत के निर्माण में बहने पर सरकार की पाई भर रकम भी खर्च नही होती। युगों युगों से पानी के द्वारा बहकर आती रेत पर किसी भी किस्म का कोई खर्च नही किया जाता। उसके बावजूद सरकार रॉयल्टी की मांग करती है। जबकि प्रत्यक्ष रूप से देखा जाए तो पृथ्वी का सीना छलनी कर पत्थरो,कोयले का उत्खनन कर पृथ्वी के भूभाग को खोखला किया जाता है और वह भी बकायदा शासकीय अनुमति प्राप्त कर।इसी तरह से धरती का सीना सैकड़ो फीट चीरकर बोर खनन किया जाता है। ये सब खनन भविष्य के लिए घातक सिद्ध हो सकते है। टूटी कलम
गौधन योजना से ज्यादा कारगर सिद्ध हो सकती है नदी धन योजना…सरकार गौधन योजना को सफल बतलाकर इतरा रही है जबकि यदि नदी धन योजना लागू कर दी जाए तो हर व्यक्ति का जीवन स्तर बढ़ सकता है साथ ही बेरोजगारी की समस्या का समाधान हो सकता है। सरकार को चाहिए कि नदी से प्रति ट्रेक्टर रेत निकालने पर एक निश्चित रकम ली जाये और रेत की ढुलाई के लिए ट्रैक्टर फाइनेंस करवा दी जाए । जिससे बेटोजगारी कि समस्या कुछ हद तक खत्म हो सकती है। नदियों में जल बहाव के साथ बहकर आती रेत की मात्रा तो कम होनी नही है। टूटी कलम
नदियों की कम होती गहराई चिंतनीय है…. समय के साथ नदियों की गहराई कम होती जा रही है। रेत के कारण कई फिट नीचे बहने वाली नदियों की गहराई बहकर आने वाली रेत की वजह से नदियों की गहराई समय के साथ कम होते जा रही है। जिस वजह से एक समय ऐसा आयेगा की नदियों के जलस्तर के कारण गांव के गांव एवं शहर के शहर जलमग्न हो जायेंगे। बहकर आने वाली रेत की वजह से भाखरा नागल,हीराकुंड डैम आदि में कई फिट रेत आ चुकी है। जिस वजह से बिजली उत्पादन में भी कमी आ जायेगी। भारत सरकार की आर्थिक स्थिति उतनी सुढृढ़ नही है कि देश की नदियों से रेत निकालकर गहरीकरण भी कर सके और यदि गहरीकरण किया भी जाये तो नदियों से निकाली गई रेत का निपटान कहां किया जा सकेगा। रेत की पीड़ा रेगिस्तान, मरुस्थल, अरब वाले समझते है। जहां लोग पीने के पानी,हरियाली,खेती,किसानी के लिए भी तरसते है। टूटी कलम
समंदर की रेत किसी लायक नही रहती…. नदियों के द्वारा समंदर में बहकर जाने वाली रेत वैसे भी किसी कार्य योग्य नही रहती क्योंकि समंदर के खारे पानी मे मिलकर रेत भी नमकीन बन जाती है जो किसी भी निर्माण कार्य के लिए अयोग्य सिद्ध होती है।टूटी कलम
सूर्य की रोशनी,चांद की शीतलता, वसयुमण्डल में बहती हवा पर सरकार टैक्स न वसूलने लग जाये कहीं…… नदियों के पानी मे बहकर आ रही निःशुल्क रेत पर सरकार राजस्व की वसूली कर रही है। जो कि किसी भी दशा में सही नही माना जाना चाहिए क्योंकि रेत के निकलने से बाढ़ आदि का खतरा कम होता है। सरकार यदि सूर्य की रोशनी,तपन,चांद की शीतलता,वायुमंडल में बहती आक्सीजन पर भी टेक्स लेने लग जाये तो शायद ही कोई विरोध किया जायेगा। टूटी कलम






