💣 टिल्लू शर्मा ✍️ टूटी कलम का विशेष लेख. मीडिया को देश का चौथा स्तंभ माना जाता है परंतु यह स्तंभ अब जर्जर हो चला है। यदि समय रहते इस की मरमत नहीं की जाएगी तो यह कभी भी धड़ाम से गिर सकता है।
शुरुआत जब प्रिंट मीडिया यानी कि अखबार से हुई थी तब प्रिंट मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता था। धीरे-धीरे प्रिंट मीडिया के बाद इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने दूरदर्शन के माध्यम से कदम रखा। यहां तक तो मीडिया की इज्जत बनी रही। जनता पत्रकार संपादक संवाददाताओं की इज्जत किया करते थे और सम्मान में सर झुकाया करते थे। संचार क्रांति के बाद सोशल मीडिया एवं वेब पोर्टल ने समाचारों में अपना दखल देना शुरू कर दिया। जिसके बाद से मीडिया की लोकप्रियता एवं साख घटते क्रम पर आ गई। परिवार में जिसे निकम्मा कहा जाता निखट्टू समझा जाता है। वे इन दिनों पीठ पर बैग टांगे हाथों में माइक लिए शासकीय दफ्तरों, उद्योगों के इर्द-गिर्द, पाए जाते हैं एवं स्वयं को मीडिया वाला बतलाकर धमकी,चमकी देते और वसूली करते आसानी से देखे जाते हैं। इन बातों को भले ही अ का अनार ना लिखना आता हो परंतु अन्य लोगों की के समाचारों की कॉपी पेस्ट कर व्हाट्सएप ग्रुप में इस तरह से वायरल करते हैं मानो समाचार उन्हीं के द्वारा लिखे गए हो। अनपढ़ किस्म के लोग समाचार बनाने के लिए वेतन भोगी कर्मचारी तक रखे हुए हैं। इन दिनों इस तरह के पत्रकारों की बाढ़ आ चुकी है। जिस वजह से मीडिया का नाम बदनाम होता जा रहा है।

पुलिस विभाग, जनसंपर्क विभाग, नगर निगम, राजनीतिक पार्टियां, समाजसेवी संस्थाएं आदि यदि अपनी प्रेस विज्ञप्तियां भेजना बंद कर दे तो शायद पत्रकार कहलाने वाले आधे से अधिक लोगों की दुकानदारी बंद हो जाएगी। विज्ञप्तियों में जो भी लिखा होता है उसे शब्दशह कॉपी पेस्ट कर आगे प्रेषित कर दिया जाता है। विज्ञप्तियों को पढ़कर उनकी त्रुटियां दूर करने तक की जहमत उठाई जाती। जो कि कुशाग्र बुद्धि का अजीब नमूना होता है।
विश्वसनीय केवल समाचार पत्रों में छपे समाचारों को ही माना जाता है.. किसी भी समाचार की प्रामाणिकता के लिए समाचार पत्र को ही माना जाता है. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एवं वेब पोर्टल वाले चाहे कितनी भी उठापटक कर ले परंतु प्रमाण के रूप में समाचार पत्र की कटिंग को ही तवज्जो दी जाती है.
पिछले दिनों स्थानीय रामनिवास टॉकीज में छत्तीसगढ़िया फिल्मों के अभिनेता अभिनेत्री के द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई थी जो कि किसी भी हाल में प्रेस वार्ता नहीं मानी जानी चाहिए क्योंकि आमंत्रित पत्रकारों को टॉकीज के बरामदे में लगी दर्शकों की कुर्सियों पर बैठना पड़ा और अधिकतर लोगों को खड़े रहना पड़ा। टॉकीज की सीढ़ियों के नीचे बने बरामदे में पत्रकारों को बैठे देखकर फिल्म देखने आए दर्शकों को भी घोर आश्चर्य हुआ एवं उन्हें भी शर्मिंदगी महसूस हुई. इन गिलो दिनों एक नया चलन चल पड़ा है की कहीं की भी ,किसी की भी प्रेस वार्ता का निमंत्रण मिलने ना मिलने पर भी पत्रकार मुंह उठाए पहुंच जाते हैं. इस वजह से असल पत्रकारिता करने वालों को सर नीचे झुकाना पड़ता है.








