रायगढ़। किसी प्लांट की ऊंची चिमनी दूर से विकास और रोजगार की पहचान दिखाई दे सकती है, लेकिन उसी ऊंचाई पर काम कर रहा कोई मजदूर अगर सुरक्षा के बिना खड़ा हो, तो वह ऊंचाई विकास की नहीं, जोखिम की ऊंचाई बन जाती है।
रायगढ़ के औद्योगिक इलाकों से समय-समय पर सामने आने वाली दुर्घटनाओं की खबरें एक बेहद गंभीर सवाल छोड़ जाती हैं—क्या हर हादसे के बाद केवल एक नई खबर बननी है, या कभी ऐसी व्यवस्था भी बनेगी जिसमें मजदूर को हादसे का शिकार होने से पहले ही बचाया जा सके?
शिव शक्ति स्टील प्लांट से सामने आया ताजा मामला भी इसी सवाल को फिर सामने खड़ा करता है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, प्लांट में मजदूरों से करीब 140 फीट की ऊंचाई पर सफाई का काम कराया जा रहा था। आरोप है कि इस दौरान पर्याप्त सुरक्षा उपकरण उपलब्ध नहीं थे। गर्म फ्लाई ऐश की चपेट में आने से दो मजदूरों के झुलसने की बात भी सामने आई है।
लेकिन असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि इस बार क्या हुआ?
सवाल यह है कि ऐसा होने से पहले क्या किया गया था?
140 फीट ऊपर… नीचे सिर्फ मौत का डर
जरा उस स्थिति की कल्पना कीजिए।
एक मजदूर जमीन से करीब 140 फीट ऊपर है। नीचे उतरने का रास्ता है, लेकिन ऊपर काम करते समय उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है? उसके शरीर पर सुरक्षा उपकरण हैं या नहीं? पैरों में सेफ्टी शूज हैं या सामान्य चप्पल? गिरने की स्थिति में उसे रोकने के लिए सुरक्षा व्यवस्था है या नहीं?
जिस व्यक्ति के लिए यह केवल कुछ घंटों की ड्यूटी है, उसके परिवार के लिए वही व्यक्ति घर चलाने वाला इंसान है।
वह मजदूर शाम को घर लौटेगा—इसी उम्मीद से काम पर जाता है।
लेकिन अगर सुरक्षा व्यवस्था में एक छोटी सी चूक हो जाए तो वही शाम उसके परिवार के लिए जिंदगी भर का अंधेरा बन सकती है।
430 रुपये की दिहाड़ी और जिंदगी का जोखिम
सामने आई जानकारी के अनुसार मजदूरों को इस काम के लिए करीब 430 रुपये प्रतिदिन मजदूरी मिलने की बात कही गई है।
430 रुपये।
क्या किसी इंसान की जिंदगी का जोखिम भी इतनी ही कीमत का है?
बेशक किसी मजदूर की जिंदगी की कीमत उसकी दिहाड़ी से नहीं लगाई जा सकती। लेकिन जब कोई व्यक्ति आर्थिक मजबूरी में जोखिम वाला काम स्वीकार करता है, तब नियोक्ता और ठेकेदार की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि उसे सुरक्षित कार्यस्थल, आवश्यक सुरक्षा उपकरण और निर्धारित सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए।
गरीबी किसी मजदूर को सुरक्षा से वंचित करने का कारण नहीं हो सकती।
हादसे के बाद संवेदना… फिर अगला हादसा?
रायगढ़ में औद्योगिक दुर्घटनाओं की खबरें समय-समय पर सामने आती रही हैं।
किसी हादसे के बाद कुछ समय के लिए चर्चा होती है।
जिम्मेदार विभागों के बयान आते हैं।
जांच की बात होती है।
कभी कार्रवाई की मांग उठती है।
मजदूर संगठन आवाज उठाते हैं।
फिर धीरे-धीरे मामला दूसरी खबरों के बीच दब जाता है।
और फैक्ट्री की मशीनें फिर चलने लगती हैं।
लेकिन क्या उस मजदूर का परिवार भी पहले जैसा हो जाता है?
जिस घर का सदस्य हादसे में घायल होता है, वहां अस्पताल के बिल आते हैं।
जिस परिवार का कमाने वाला व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हो जाता है, वहां बच्चों की पढ़ाई रुक सकती है।
और अगर किसी हादसे में मजदूर की जान चली जाए, तो उसके परिवार के लिए कोई जांच रिपोर्ट उस व्यक्ति को वापस नहीं ला सकती।
यही वह जगह है जहां केवल ‘हादसा’ शब्द बहुत छोटा पड़ जाता है।
मजदूर मशीन का पुर्जा नहीं है
औद्योगिक उत्पादन जरूरी है।
फैक्ट्रियां जरूरी हैं।
रोजगार जरूरी है।
लेकिन इन सबसे ज्यादा जरूरी है—इंसान की जिंदगी।
एक प्लांट में उत्पादन रुकने से आर्थिक नुकसान हो सकता है।
लेकिन एक मजदूर की जिंदगी रुकने से एक पूरा परिवार टूट सकता है।
मजदूर मशीन का वह पुर्जा नहीं है जिसे खराब होने पर बदला जा सके।
वह किसी का बेटा है।
किसी का पति है।
किसी का पिता है।
किसी के घर की उम्मीद है।
इसलिए सुरक्षा उपकरण कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं हैं। वे उस मजदूर के घर लौटने की गारंटी की दिशा में सबसे बुनियादी आवश्यकता हैं।
सवाल सिर्फ शिव शक्ति स्टील से नहीं, पूरी व्यवस्था से है
इस मामले में मजदूरों की ओर से सुरक्षा उपकरण, मजदूरी, PF और बीमा जैसी सुविधाओं को लेकर भी आरोप लगाए गए हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है और संबंधित प्रबंधन का पक्ष सामने आना भी आवश्यक है।
लेकिन सवाल इससे बड़ा है।
क्या औद्योगिक क्षेत्रों में नियमित रूप से यह जांच होती है कि ऊंचाई पर काम करने वाले मजदूरों के पास आवश्यक सुरक्षा उपकरण हैं या नहीं?
क्या ठेका मजदूरों के लिए सुरक्षा मानकों की उतनी ही गंभीरता से जांच होती है जितनी स्थायी कर्मचारियों के लिए?
क्या दुर्घटना के बाद ही अधिकारी जागते हैं या दुर्घटना से पहले भी निरीक्षण होता है?
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या किसी मजदूर की जान जाने का इंतजार किए बिना व्यवस्था कार्रवाई कर सकती है?
आज खबर है, कल किसी के घर का मातम न बने
हम अक्सर दुर्घटना की खबर पढ़ते हैं और अगली खबर पर चले जाते हैं।
लेकिन जिस मजदूर का नाम खबर में आता है, उसके घर में उस खबर का असर कई साल तक रहता है।
किसी के शरीर पर पड़े जलने के निशान सिर्फ अस्पताल से छुट्टी मिलने के साथ खत्म नहीं होते।
किसी परिवार के कमाने वाले व्यक्ति के घायल होने का असर महीनों और वर्षों तक रहता है।
और मौत की स्थिति में तो पूरा परिवार अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा सहारा खो देता है।
इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि अगला हादसा कब होगा।
सवाल यह होना चाहिए कि अगला हादसा होने से पहले व्यवस्था क्या कर रही है?
अगर हर दुर्घटना के बाद सिर्फ खबर बनेगी, कुछ दिनों तक चर्चा होगी और फिर सब सामान्य हो जाएगा, तो अगली बार भी कोई मजदूर उसी जोखिम के सामने खड़ा मिलेगा।
और तब शायद हम फिर यही लिखेंगे—
“एक और हादसा।”
लेकिन किसी मजदूर के परिवार के लिए वह सिर्फ एक हादसा नहीं होगा।
वह उसके पूरे जीवन का अंत होगा।
अब जरूरत हादसे के बाद कार्रवाई की नहीं, हादसा होने से पहले सुरक्षा सुनिश्चित करने की है।
क्योंकि किसी भी प्लांट की सबसे बड़ी उपलब्धि उसका उत्पादन नहीं हो सकती।
सबसे बड़ी उपलब्धि यह होनी चाहिए कि काम पर गया हर मजदूर सुरक्षित अपने घर वापस लौटे।


