🔱 टिल्लू शर्मा ✒️ टूटी कलम 🎤 न्यूज़ रायगढ़ 🌍 छत्तीसगढ़..
स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगे के साथ पत्रकारिता की कलम को भी सलाम करने का समय है या उसका हिसाब मांगने का?
आज देश आजादी का जश्न मना रहा है।
हर तरफ तिरंगा है, देशभक्ति के गीत हैं, स्वतंत्रता सेनानियों की तस्वीरें हैं और आजादी के संघर्ष की गौरवगाथाएं हैं।
लेकिन इसी आजादी के दिन एक सवाल पत्रकारिता से भी पूछा जाना चाहिए—
जिस देश में नागरिकों को बोलने की आजादी मिली, क्या उस देश की पत्रकारिता की कलम भी आजाद है?
यह सवाल इसलिए जरूरी है क्योंकि पत्रकारिता को लोकतंत्र का प्रहरी कहा गया है।
लेकिन आज कई जगहों पर प्रहरी की हालत देखकर लगता है कि वह जिस दरवाजे की रखवाली करने निकला था, उसी दरवाजे के मालिक से उसका हिसाब-किताब चल रहा है।
कलम जनता की आवाज बनने के लिए मिली थी, लेकिन कहीं वह नेता की प्रशंसा लिखने में व्यस्त है, कहीं अधिकारी की उपलब्धियां गिनाने में, कहीं उद्योगपति की प्रतिष्ठा चमकाने में और कहीं अपने निजी हितों की सुरक्षा में।
समस्या यह नहीं है कि पत्रकारिता बदल गई है। समस्या यह है कि कई जगहों पर पत्रकारिता का मतलब ही बदल गया है।
पत्रकारिता या प्रेस विज्ञप्ति प्रसारण सेवा?
आज पत्रकारिता का सबसे आसान तरीका क्या है?
किसी सरकारी विभाग की प्रेस विज्ञप्ति आई।
कॉपी की।
पेस्ट किया।
शीर्षक लगाया।
वेबसाइट पर डाल दिया।
फेसबुक पर शेयर कर दिया।
और पत्रकारिता पूरी।
पुलिस की विज्ञप्ति आई—खबर तैयार।
नगर निगम की विज्ञप्ति आई—खबर तैयार।
जनसंपर्क विभाग की विज्ञप्ति आई—खबर तैयार।
किसी मंत्री के कार्यालय से विज्ञप्ति आई—खबर तैयार।
किसी नेता के निजी कार्यालय से विज्ञप्ति आई—खबर तैयार।
किसी उद्योगपति या तथाकथित समाजसेवी की विज्ञप्ति आई—वह भी खबर तैयार।
कभी-कभी तो स्थिति ऐसी दिखाई देती है कि अगर विज्ञप्ति में लिख दिया जाए कि “आज पत्रकारिता दिवस पर पत्रकारों ने पत्रकारिता नहीं की”, तो संभव है वह भी अगले दिन कई जगह खबर बनकर दिखाई दे।
क्योंकि पढ़ने की जरूरत नहीं।
समझने की जरूरत नहीं।
जांचने की जरूरत नहीं।
सवाल पूछने की जरूरत नहीं।
बस भेजी गई सामग्री को छापना है।
जब पत्रकार खुद खबर नहीं खोजता और खबर उसके मोबाइल पर आकर बैठ जाती है, तब पत्रकार और प्रेस विज्ञप्ति के बीच अंतर कितना बचता है?
विज्ञप्ति में गुणगान, खबर में भी गुणगान
प्रेस विज्ञप्ति का अपना चरित्र होता है।
नेता अपने काम की तारीफ करेगा।
अधिकारी अपने विभाग की उपलब्धियां बताएगा।
पुलिस अपनी कार्रवाई को सफलता के रूप में प्रस्तुत करेगी।
संस्था अपनी उपलब्धियों को ऐतिहासिक बताएगी।
व्यापारी अपने सामाजिक कार्यों को जनसेवा बताएगा।
यह सब समझ में आता है।
लेकिन जब वही भाषा बिना किसी जांच-पड़ताल के समाचार बन जाए, तब समस्या शुरू होती है।
“ऐतिहासिक”, “अभूतपूर्व”, “शानदार”, “जनता में खुशी की लहर”, “हर वर्ग में उत्साह”, “जनता ने जमकर सराहा” जैसे शब्द विज्ञप्ति लिखने वाले ने लिखे और पत्रकार ने भी बिना सोचे समझे छाप दिए।
जनता में खुशी की लहर थी या नहीं, यह पूछने की जहमत तक नहीं।
कितने लोग खुश थे, यह जानने की कोशिश तक नहीं।
किसी ने विरोध किया या कोई समस्या थी, इसका पता लगाने की जरूरत तक नहीं।
विज्ञप्ति में अगर लिख दिया गया कि “कार्यक्रम को लेकर लोगों में भारी उत्साह रहा”, तो खबर में भी वही।
आखिर पत्रकारिता की जरूरत ही क्या रह गई?
विज्ञप्ति लिखने वाला ही खबर लिख दे और पत्रकार सिर्फ प्रकाशक बन जाए—इससे बड़ी विडंबना क्या होगी?
कलम किसकी है?
पत्रकारिता में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि पत्रकार के पास कितने साधन हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है—
उसकी कलम किसके लिए चलती है?
जनता के लिए?
या उस नेता के लिए जिसके कार्यालय से हर दिन खबर मिलती है?
उस अधिकारी के लिए?
जिससे अच्छे संबंध बनाए रखना जरूरी समझा जाता है?
उस कारोबारी के लिए?
जिसके विज्ञापन से संस्थान चलता है?
या फिर अपने उस कारोबार के लिए, जिसे पत्रकारिता की पहचान का कवच चाहिए?
यह सवाल कड़वा है।
लेकिन आज इसे पूछने की जरूरत है।
पत्रकारिता : कुछ लोगों के लिए पहचान का कवच?
पत्रकारिता एक गंभीर सामाजिक जिम्मेदारी है।
लेकिन कई जगहों पर यह भी देखने को मिलता है कि कुछ लोग पत्रकारिता को अपनी सामाजिक हैसियत बढ़ाने, प्रभाव जमाने या निजी हित साधने के साधन के रूप में इस्तेमाल करने लगते हैं।
कहीं व्यक्ति का अपना कारोबार है।
कहीं ठेकेदारी है।
कहीं जमीन-जायदाद का काम है।
कहीं निजी व्यापार है।
कहीं किसी संस्था से जुड़ा हित है।
और फिर उसके हाथ में प्रेस कार्ड आ जाता है।
माइक आ जाता है।
कैमरा आ जाता है।
अचानक वही व्यक्ति समाज में एक नई पहचान के साथ दिखाई देने लगता है।
सवाल यह नहीं कि पत्रकार कोई दूसरा काम कर सकता है या नहीं।
सवाल यह है कि क्या पत्रकारिता का इस्तेमाल अपने दूसरे हितों के संरक्षण के लिए किया जा रहा है?
अगर पत्रकारिता किसी निजी कारोबार की ढाल बन जाए तो फिर वह पत्रकारिता नहीं रहती।
वह प्रभाव का इस्तेमाल बन जाती है।
प्रेस कार्ड की ताकत या कलम की ताकत?
आज कुछ जगहों पर प्रेस कार्ड को पत्रकारिता का प्रमाण मान लिया गया है।
गले में कार्ड लटक गया।
हाथ में माइक आ गया।
मोबाइल से वीडियो बनने लगा।
और व्यक्ति पत्रकार बन गया।
लेकिन पत्रकारिता केवल पहचान पत्र नहीं है।
पत्रकारिता एक जिम्मेदारी है।
समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब पत्रकारिता की पहचान का इस्तेमाल लोगों पर प्रभाव डालने, काम निकलवाने या अपने निजी विवादों में दबाव बनाने के लिए किया जाए।
जिस प्रेस कार्ड का इस्तेमाल जनता की आवाज उठाने के लिए होना चाहिए, यदि वही किसी निजी काम के लिए दबाव का साधन बनने लगे तो सवाल प्रेस कार्ड पर नहीं, उसकी मानसिकता पर उठता है।
अपराध की दुनिया से निकलकर पत्रकारिता की दुनिया?
पत्रकारिता के क्षेत्र में एक और गंभीर चिंता उन लोगों को लेकर है जो किसी कारण से सामाजिक या आपराधिक विवादों में चर्चित रहे हों और बाद में पत्रकारिता की पहचान को अपने लिए सुरक्षा कवच या प्रभाव के माध्यम के रूप में इस्तेमाल करने लगें।
यह कहना गलत होगा कि हर ऐसा व्यक्ति पत्रकारिता में गलत काम करता है।
लेकिन प्रवृत्ति पर सवाल उठाना जरूरी है।
यदि किसी व्यक्ति की पहचान समाज में पहले किसी विवाद, दबंगई या आपराधिक गतिविधि से बनी रही हो और बाद में उसके हाथ में प्रेस कार्ड आ जाए, तो समाज के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है—
क्या पत्रकारिता जनसेवा का माध्यम बनी है या नई पहचान हासिल करने का रास्ता?
और यदि कोई व्यक्ति पत्रकार होने की पहचान का इस्तेमाल लोगों को डराने, धमकाने, निजी विवादों में हस्तक्षेप करने या अपने प्रभाव का प्रदर्शन करने के लिए करता है, तो वह केवल पत्रकारिता को नहीं, पूरे मीडिया समुदाय की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाता है।
कलम अगर सवाल पूछने की जगह डर पैदा करने लगे, तो वह कलम नहीं रहती।
पढ़ाई से ज्यादा जरूरी बन गया परिचय?
पत्रकारिता में डिग्री होना अनिवार्य हो या न हो, इस पर बहस हो सकती है।
लेकिन पत्रकार का पढ़ा-लिखा होना, भाषा की समझ होना, संविधान और कानून की बुनियादी जानकारी होना, तथ्यों को समझने और परखने की क्षमता होना—इन सबकी जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता।
दुर्भाग्य से कुछ जगहों पर पत्रकारिता में ऐसे लोग भी दिखाई देते हैं जिनकी शैक्षणिक और बौद्धिक तैयारी बेहद कमजोर है।
समस्या कम पढ़े-लिखे होने भर की नहीं है।
समस्या तब है जब ज्ञान की कमी के बावजूद ज्ञान का अहंकार बहुत ज्यादा हो।
खबर का अर्थ नहीं पता।
कानून की बुनियादी जानकारी नहीं।
भाषा पर पकड़ नहीं।
तथ्य और आरोप में अंतर नहीं।
फिर भी कलम हाथ में है और फैसला सुनाने की जल्दबाजी है।
किसी को आरोपी लिख दिया।
किसी को अपराधी बना दिया।
किसी को भ्रष्ट घोषित कर दिया।
किसी को महान बना दिया।
न पत्रकारिता का व्याकरण समझा, न कानून की भाषा—लेकिन खबर लिखने का अधिकार पूरा चाहिए।
यही विडंबना है।
पत्रकारिता में शिक्षा से ज्यादा जरूरी है सीखने की भूख
यह भी सच है कि केवल डिग्री से पत्रकार नहीं बनता।
कई महान पत्रकारों की ताकत उनकी जिज्ञासा, अनुभव, अध्ययन और जमीन से जुड़ाव रहा है।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि पत्रकार पढ़े ही नहीं।
यदि कोई पत्रकार वर्षों तक काम करने के बाद भी संविधान, कानून, प्रशासन, अर्थव्यवस्था, स्थानीय शासन, सामाजिक मुद्दों और भाषा की बुनियादी समझ विकसित नहीं करता, तो समस्या उसकी डिग्री की नहीं, उसकी सीखने की इच्छा की है।
पत्रकारिता में सबसे खतरनाक चीज कम ज्ञान नहीं है।
कम ज्ञान और अत्यधिक आत्मविश्वास का गठजोड़ है।
नेताओं के दरबार में बैठी पत्रकारिता
एक समय पत्रकार सत्ता से सवाल पूछता था।
आज कुछ जगहों पर पत्रकार सत्ता के साथ फोटो खिंचवाने में ज्यादा उत्सुक दिखाई देता है।
नेता आए—फोटो।
नेता ने माला पहनाई—फोटो।
नेता ने हाथ मिलाया—फोटो।
नेता के साथ चाय—फोटो।
नेता के साथ मंच—फोटो।
और फिर अगले दिन खबर—
“पत्रकारों के बीच लोकप्रिय नेता…”
यह खबर है या संबंधों की सार्वजनिक घोषणा?
पत्रकार का नेता से मिलना गलत नहीं।
पत्रकार का अधिकारी से संबंध होना गलत नहीं।
पत्रकार का समाज के हर वर्ग से संपर्क होना आवश्यक है।
लेकिन जब संपर्क चापलूसी में बदल जाए और चापलूसी खबर में बदल जाए, तब पत्रकारिता की रीढ़ दिखाई नहीं देती।
समाजसेवा के नाम पर प्रचार
आज समाजसेवा भी कई बार खबरों का बड़ा विषय है।
किसी ने कंबल बांटे।
किसी ने भोजन कराया।
किसी ने पौधे लगाए।
किसी ने रक्तदान किया।
किसी ने गरीबों की मदद की।
अच्छा काम है।
लेकिन सवाल यह है कि हर छोटे-बड़े आयोजन की प्रेस विज्ञप्ति क्यों बनती है?
और हर विज्ञप्ति खबर क्यों बनती है?
कहीं ऐसा तो नहीं कि समाजसेवा से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका प्रचार हो गया है?
पहले सेवा होती थी और कभी-कभी खबर बनती थी। अब कई बार पहले कैमरा आता है, फिर सेवा दिखाई जाती है।
यह फर्क समझना जरूरी है।
पत्रकारिता में सबसे महंगा शब्द—“विज्ञापन”
मीडिया संस्थानों को चलाने के लिए पैसा चाहिए।
यह वास्तविकता है।
विज्ञापन चाहिए।
राजस्व चाहिए।
पत्रकारों को वेतन चाहिए।
तकनीक चाहिए।
ऑफिस चाहिए।
इसमें कोई बुराई नहीं।
लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब विज्ञापन और खबर के बीच की दीवार गिर जाती है।
जिसके विज्ञापन ज्यादा हैं, उसकी खबर ज्यादा।
जिसके विज्ञापन नहीं हैं, उसका काम भी नजरअंदाज।
फिर खबर का महत्व जनता तय नहीं करती।
बजट तय करता है।
और जहां खबर का मूल्य उसकी जनहित की ताकत से नहीं, आर्थिक लाभ से तय होने लगे, वहां पत्रकारिता धीरे-धीरे अपना भरोसा खोने लगती है।
सबसे दुखद स्थिति : पत्रकार खुद पत्रकारिता को गंभीरता से न ले
पत्रकारिता की सबसे बड़ी कमजोरी बाहर से नहीं आती।
सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होता है जब पत्रकार खुद अपने पेशे को हल्के में लेने लगे।
जब उसे खबर खोजने में मेहनत लगे और प्रेस विज्ञप्ति आसान लगे।
जब सवाल पूछने में डर लगे और प्रशंसा लिखने में सुविधा।
जब तथ्य जांचने में समय लगे और कॉपी-पेस्ट करने में दो मिनट।
जब जनता से बात करने की जगह नेता के कार्यालय से फोन आने का इंतजार हो।
जब रिपोर्टिंग से ज्यादा महत्व परिचय को मिलने लगे।
जब पत्रकारिता से ज्यादा महत्वपूर्ण पत्रकार कहलाना हो जाए।
तब समस्या केवल मीडिया की नहीं रहती—समस्या पत्रकारिता की आत्मा की हो जाती है।
आजादी के दिन सबसे बड़ा सवाल
आज हम देश की आजादी का उत्सव मना रहे हैं।
लेकिन पत्रकारिता के सामने एक असहज सवाल खड़ा है—
क्या हमारी कलम स्वतंत्र है?
क्या वह उस नेता के खिलाफ भी लिख सकती है जिसके साथ उसके अच्छे संबंध हैं?
क्या वह उस अधिकारी से सवाल पूछ सकती है जिसके कार्यालय से रोज खबर मिलती है?
क्या वह उस कारोबारी के खिलाफ खबर चला सकती है जिसके विज्ञापन से मीडिया संस्थान चलता है?
क्या वह अपने परिचित व्यक्ति की गलती को भी गलती लिख सकती है?
क्या वह अपनी ही खबर में गलती होने पर उसे स्वीकार कर सकती है?
अगर इन सवालों के जवाब कमजोर हैं तो स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगे को सलाम करने के साथ पत्रकारिता को अपनी कलम की ओर भी देखना चाहिए।
क्योंकि गुलामी हमेशा हथकड़ी से नहीं होती
गुलामी केवल जेल की सलाखों में नहीं होती।
कभी-कभी गुलामी स्वार्थ की होती है।
कभी संबंधों की।
कभी विज्ञापन की।
कभी राजनीतिक संरक्षण की।
कभी आर्थिक मजबूरी की।
कभी निजी हितों की।
और कभी-कभी सिर्फ इस डर की कि अगर सच लिख दिया तो अगली प्रेस विज्ञप्ति नहीं आएगी।
कलम हाथ में हो और फिर भी सच लिखने की आजादी न हो—इससे बड़ी विडंबना क्या होगी?
पत्रकारिता का सबसे बड़ा संकट खबरों की कमी नहीं, रीढ़ की कमी है
आज खबरों की कोई कमी नहीं।
मोबाइल हर हाथ में है।
कैमरा हर जेब में है।
सोशल मीडिया हर समय सक्रिय है।
प्रेस विज्ञप्तियां हर दिन आती हैं।
वीडियो हर मिनट बन रहे हैं।
फिर भी सवाल है—
स्वतंत्र पत्रकार कहां है?
वह पत्रकार जो भीड़ से अलग जाकर पूछे—
“इस दावे का प्रमाण क्या है?”
वह पत्रकार जो कहे—
“विज्ञप्ति में यह लिखा है, लेकिन जमीन पर स्थिति कुछ और क्यों है?”
वह पत्रकार जो सत्ता से पूछे—
“यह काम हुआ तो इसका लाभ किसे मिला?”
वह पत्रकार जो अपने परिचित से भी कह सके—
“आप गलत हैं।”
वह पत्रकार जो किसी गरीब की आवाज को इसलिए खबर बनाए क्योंकि वह जरूरी है, न कि इसलिए क्योंकि उससे व्यूज आएंगे।
स्वतंत्रता दिवस पर पत्रकारिता को भी आईना चाहिए
देश स्वतंत्र है।
लोकतंत्र जीवित है।
संविधान मौजूद है।
अभिव्यक्ति की शक्ति मौजूद है।
लेकिन इन सबके बीच पत्रकारिता की विश्वसनीयता जनता के भरोसे से बनती है।
और भरोसा प्रेस कार्ड से नहीं मिलता।
भरोसा बड़े-बड़े शब्दों से नहीं मिलता।
भरोसा किसी नेता के साथ फोटो से नहीं मिलता।
भरोसा किसी अधिकारी के फोन से नहीं मिलता।
भरोसा किसी विज्ञापन से नहीं मिलता।
भरोसा तब मिलता है जब जनता यह मानती है कि पत्रकार जो लिख रहा है, वह किसी के दबाव में नहीं, तथ्य के आधार पर लिख रहा है।
और अंत में…
आज स्वतंत्रता दिवस है।
आज तिरंगा हमें याद दिला रहा है कि आजादी कितनी मुश्किल से मिली थी।
शायद पत्रकारिता को भी आज अपने आप से एक सवाल पूछना चाहिए—
क्या जिस कलम को लोकतंत्र की आवाज बनना था, वह कहीं किसी के दरबार की कलम तो नहीं बन गई?
क्या जिस पत्रकार को जनता के सवाल पूछने थे, वह खुद किसी के सवालों का जवाब देने में व्यस्त है?
क्या जिस प्रेस कार्ड को समाज की आवाज बनना था, वह कहीं व्यक्तिगत प्रभाव का परिचय पत्र तो नहीं बन गया?
क्या जिस खबर को सच सामने लाना था, वह कहीं प्रेस विज्ञप्ति का कॉपी-पेस्ट संस्करण तो नहीं बन गई?
क्या जिस पत्रकार को सत्ता के सामने खड़ा होना था, वह कहीं सत्ता के साथ मंच साझा करने में ही संतुष्ट तो नहीं हो गया?
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या पत्रकारिता अभी भी जनता के लिए है, या जनता अब सिर्फ पत्रकारिता की खबरों के लिए रह गई है?
स्वतंत्रता दिवस पर देश को शुभकामनाएं।
लेकिन पत्रकारिता को सिर्फ शुभकामनाएं नहीं—
एक आईना चाहिए।
क्योंकि तिरंगे के नीचे खड़े होकर आजादी का जश्न मनाना आसान है।
आजादी की तरह स्वतंत्र होकर लिखना कठिन है।
और शायद यही आज की पत्रकारिता का सबसे कड़वा सच है—
कलम हाथ में है, प्रेस कार्ड गले में है, कैमरा सामने है…
फिर भी सवाल यह है कि क्या पत्रकार वास्तव में आजाद है?

