रायगढ़ जिले का बहुचर्चित, विश्वसनीय, पाठको की पहली पसंद नंबर वन के पायदान पर न्यूज वेब पोर्टल “टूटी कलम” अपनी लोकप्रियता की वजह से छत्तीसगढ़ स्तर पर जाना पहचाना जाने लगा है. संपादक निडर,निष्पक्ष,निर्भीक, बेबाक,बेखौफ, असलियत से नाता रखने वाला, लेखक, चिंतक, विचारक, विश्लेषक, व्यंग्यकार,स्तंभकार,कलमकार, माता सरस्वती का उपासक, लेखनी का धनी, कलम का मास्टरमाइंड चंद्रकांत (टिल्लू) शर्मा रायगढ़ छत्तीसगढ़ 83192 93002
🎤टिल्लू शर्मा ✒️ टूटी कलम रायगढ़ … रायगढ़ सिक्ख समाज के द्वारा गुरु गोविंद सिंह के चार पुत्रों की शहादत को बाल दिवस सप्ताह के रूप में मनाया जा रहा है. प्रतिदिन संध्या 6:00 बजे से अनवरत गरमा गरम,स्वादिष्ट,मीठा दूध एवं बिस्किट की सेवा सार्वजनिक रूप से की जा रही है. जिसमें सिक्ख समाज के वरिष्ठ नागरिको, युवकों, बच्चों, महिलाओं,युवतियों,बच्चियों के द्वारा अत्यंत उत्साहित होकर गुरुद्वारे के सामने से गुजरने वाले सभी लोगों को गरमा गरम दूध और बिस्किट की सेवा प्रदान की जा रही है. सिक्ख समाज की सेवा भावना की प्रशंसा सर्वत्र हो रही है. एक ओर जहां पानी पिलाने के नाम पर लाखों रुपए का चंदा अनेक संस्थाओं के द्वारा कर लिया जाता है. संस्था का नाम एवं स्वयंभू के रूप खुद को आगे बढ़ने का प्रयास किया जाता है. वही सिक्ख समाज के द्वारा बगैर किसी का नाम प्रचारित करें.सेवा भावना से सही तरीके से सेवा प्रदान की जा रही है.
27 दिसम्बर सन् 1704 को दोनों छोटे साहिबजादे और जोरावर सिंह व फतेह सिंहजी को दीवारों में चुनवा दिया गया
सिक्खों के दशम् गुरू श्री गुरूगोविंद सिंह के पुत्रों की शहादत को शहीदी सप्ताह के रूप में गुरूद्वारे में मनाया जाता है। ।
गुरूसिंघ सभा के अध्यक्ष रविंद्र सिंह भाटिया ने बताया कि 21 दिसंबर से 22 दिसंबर सिक्ख इतिहास का सबसे बड़ा शहीदी सप्ताह है। उन्होंने बताया कि 22 दिसम्बर को गुरु गोबिंद सिंह 40 सिक्ख फौजों के साथ चमकौर के एक कच्चे किले में 10 लाख मुगल सैनिको से मुकाबला कर रहे थे।
इस युद्ध में गुरु गोबिंद सिंह जी के बड़े बेटे 17 वर्ष के अजीत सिंह मुगलों से लड़ते हुए शहीद हुए। बड़े भाई की सहादत को देखते हुए 14 वर्ष के पुत्र जुझार सिंह ने पिता से युद्ध के मैदान में जाने की अनुमति मांगी। एक पिता ने अपने हाथो से पुत्र को सजाकर युद्ध के मैदान में भेजा।
मुगलों पर भारी साहेबजादा जुझार सिंह ने युद्ध के मैदान में दुश्मनों के छे छुड़ा दिए और लड़ते लड़ते वीरगति को प्रा’त हुए। दूसरी ओर गुरु के दोनों छोटे बेटे जोरावर सिंह 5 वर्ष और फतेह सिंह 7 वर्ष अपनी दादी माता गुजरी जी के साथ युद्ध के दौरान पिता से बिछड़ गए।
सरहंद के नवाब वजीर खान ने उन्हें बंदी बना लिया। इस्लाम कबूल न करने पर 27 दिसम्बर को दोनों को दीवार में चुनवा दिया गया था।
माता गुजरी को किले से नीचे फिकवा दिया।
