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🔱टिल्लू शर्मा टूटी ✒️ कलम 🎤 न्यूज 🌍 रायगढ़ छत्तीसगढ़ 🌍 दंतेवाड़ा के इतिहास में कुछ अध्याय ऐसे लिखे गए हैं जिन्हें समय की धूल कभी धुंधला नहीं कर सकती। आज जब हम गीदम की उस भव्य ‘एजुकेशन सिटी’ की ओर देखते हैं, जहाँ हजारों आदिवासी बच्चों की खिलखिलाहट गूंजती है, तो जेहन में एक ही चेहरा उभरता है वह है तत्कालीन कलेक्टर ओपी चौधरी।
एजुकेशन सिटी एक मात्र भवनो का निर्माण नहीं था, बल्कि आतंक के साये में नन्हे परिंदों के भविष्य को गढ़ने का दुस्साहस था।
वह दौर भयानक भय और आतंक चर्म सीना पर था!जब दंतेवाड़ा की हवाओं में फूलों की महक नहीं, बल्कि बारूद की गंध घुली रहती थी। कदम-कदम पर मौत का साया था और नक्सलियों के आतंक से पूरा तंत्र सहमा हुआ था।
गीदम थाने का वह भव्य भवन, जिसे उद्घाटन से पहले ही धमाकों ने जमींदोज कर दिया था, एक चेतावनी थी कि यहाँ सपनों की नींव रखना कितना जानलेवा हो सकता है। उस धमाके की गूंज से निर्माणाधीन एजुकेशन सिटी की दीवारें ही नहीं, बल्कि आम मानस की उम्मीदें भी हिल गई थीं।
मगर, इतिहास गवाह है कि जब लक्ष्य चट्टान की तरह अटल हो, तो जटिल मार्ग भी रास्ता छोड़ देते हैं। एक तरफ नक्सलियों का काला साया था, तो दूसरी तरफ एक युवा आईएएस अधिकारी ओपी का वह दृढ़ संकल्प, जिनके आंखों में बस्तर के मासूमों के लिए ‘छू लो आसमान’ और ‘आस्था विद्या मंदिर’ नन्हे परिंदे सक्षम जैसे संस्थाओं के सपने पल रहे थे।
•जोखिम और जज्बा के साथ
जब कलेक्टर ओपी को बदलनी पड़ती थी गाड़ियां…!!
ओपी चौधरी के लिए वह मात्र 12 किलोमीटर का सफर नहीं था। जिला मुख्यालय से गीदम तक के उस हाईवे पर उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए रास्ते में बार-बार वाहन बदलने पड़ते थे। कभी निजी गाड़ियां, तो कभी मोटरसाइकिल से सतर्कता के साथ चलना होता था.! बरमुंडा, लोअर टी शर्ट पैरों में मामूली सिलिपर सादगी का प्रतीक था एका एक विश्वास भी नहीं होता था जो साधारण व्यक्ति खड़ा है वह कलेक्टर है। अधीनस्थ कर्मचारियों का मनोबल न टूटे इस लिए समय बदल कर निर्माण स्थलों पर जरूर पहुंचते थे। जिसके चलते नक्सलियों के पोस्टर ओर लेटर पैड में ओपी का उल्लेख होना तो तय ही था! इसके बाद भी अपनी जान को जोखिम में डालकर पहुँचना यह दर्शाता था कि उनके लिए अपनी जान से भी ज्यादा कीमती उन 5000 बच्चों का भविष्य जो था।
आतंक के उस काले दौर में ओपी चौधरी एक ऐसे ‘शिक्षा के लौह पुरुष’ बनकर उभरे, जिन्होंने अंगद के पैर की तरह शिक्षा की मशाल को दंतेवाड़ा की धरती पर रोपित कर दिया।
•सपनों की आधारशिला और सुखद परिणाम”
आज वह सपना सच हो चुका है। राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री तक उस पावन भूमि के साक्षी समय समय बने। आज जब बस्तर का कोई आदिवासी बच्चा डॉक्टर या इंजीनियर जैसे पद लेकर निकलता है, तो यह निश्चित उसी संकल्प की फसल है जिसे ओपी चौधरी ने अपने पसीने और जोखिम से सींचा था। उनकी वह मुस्कुराती हुई आकृति आज भी मानो यही कहती है कि यदि ईमानदारी और दृढ़ इच्छाशक्ति हो, तो दुर्गम से दुर्गम लक्ष्य भी हासिल किया जा सकता है।
ओपी चौधरी जैसे विरले व्यक्तित्व सदियों में एक बार आते हैं, जो अपनी सुख-सुविधाओं की चिंता छोड़कर दूसरों के भविष्य की चिंता करते हैं। एजुकेशन सिटी जावगा आज केवल एक संस्था नहीं, बल्कि संघर्ष और जीत का एक जीवंत प्रतीक है। दंतेवाड़ा की माटी इस भागीरथ प्रयास को और शिक्षा के इस प्रकाश स्तंभ को कभी नहीं भुला पाएगी।
“आज उन गलियारों में ओपी चौधरी की एक मुस्कुराती हुई तस्वीर या पोस्टर का होना नितांत आवश्यक है। वह तस्वीर बच्चों को हर पल यह याद दिलाएगी कि उनकी आज की बेखौफ मुस्कुराहट के पीछे कल का एक बड़ा त्याग और जोखिम खड़ा था। यह पोस्टर विद्यार्थियों को प्रेरित करेगा कि कठिन परिस्थितियों में भी अगर लक्ष्य पवित्र हो, तो मुस्कुराहट कभी फीकी नहीं पड़ती। सच तो यह है कि उन बच्चों की सफलता ही ओपी की असली मुस्कान है..✍️✍️✍️
साभार
{दिनेश शर्मा}
वरिष्ठ पत्रकार
दंतेवाड़ा




