रायगढ़—- आम दिनों अपनी कद काठी, पहुंच का इस्तेमाल करने वाले मानव चुंहे इन दिनों किसी भी जगह नजर नही आ रहे है.
रँगा सियार शेर की खाल ओढ़ लोगो को डराता था मगर अंततः रात में हूं हा किया करता था.आखिर झूठ कब तक साथ देता है.अंततः जंगल मे कर्फ्यू लगने के बाद सियार को अपने असली रूप में आना ही पड़ गया. जो लोग सियार को शेर समझ बैठे थे वे ही अब तथाकथित शेर को धकियाने लगे है.मगर मुंह मे खून लगने के बाद सियार काल रिकार्डिंग का सहारा लेकर अपने आपको शेर साबित करने पर तुला है परन्तु उगता हुआ भाष्कर संध्या में डूब ही जाता है.केलो मैया कभी कभार ही उफान पर आती है जिसमे हांथी भी डूबने से नही बच पाते. जनता का रिश्ता तो महज ढकोसला ही होता है जबकि देखा जाये तो यह महज एक सहारा ही होता है.जिसके कारण अपनी उपस्थिति दर्ज मात्र करवाने के लिये. “निर्बल को न सताइये जाके बुरी हाय” किसी को कमजोर समझना भारी भी पड़ सकता है.आखिर बाप बाप होता है.यह दुनिया तेल मालिश,थूक पालिस से नही चलती.इसके लिये अपना वजूद पैदा करना पड़ता है.मेहनत करनी पड़ती है,ईमानदारी दिखलानी पड़ती है,संघर्ष करना पड़ता है,वाइस टाइपिंग से नही अपितु खुद की कलम चलानी पड़ती है.ब्रेकिंग के सहारे नही जिया जाता । भूत, वर्तमान, भविष्य पर चिंता व्यक्त की जाती है.तब जाकर कहीं सम्मान मिलता है अन्यथा दुत्कार से ही जीवन यापन करना पड़ता है.








