🌀 टिल्लू शर्मा ✒️टूटी कलम रायगढ़ हिंदुओं में प्रथम देव के रूप में गणेश भगवान प्रसिद्धि पा चुके हैं। ऐसी मान्यता है कि कोई भी शुभ कार्य करने से पहले गणेश वंदना करना आवश्यक होता है। यह वरदान देवों के देव गणेश जी के पिता महादेव ने दिया था। जिसके बाद से विघ्नहर्ता सुपरस्टार भगवान के रूप में पूजे जाने लगे। यज्ञ ,हवन, पूजा पाठ, मस्त धार्मिक आयोजनों में सर्वप्रथम गणेश जी की पूजा की जाती है अन्यथा इसके बगैर कार्य सफल होना नहीं माना जाता है।
भादो मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन पूरे हिंदुस्तान में घर-घर में गणपति बप्पा की मूर्ति स्थापित कर अपनी श्रद्धा अनुसार तीन ,पांच,सात,नौ,दस,ग्यारह दिनों तक सुबह शाम पूजा पाठ कर नदी,तालाबों,बहते हुए जल में मूर्ति विसर्जित की जाती है। विसर्जन के दौरान लोग फिल्मी धुनों,गानों पर कर्मा पार्टी, डीजे,बैंड,धुमाल के साथ नाचते,थिरकते चलते हैं। रंग, गुलाल, आतिशबाजी, पटाखे चलाए जाते हैं।
मूर्ति विसर्जन के बाद मिट्टी से बनी मूर्तियां पानी में गल जाया करती है परंतु प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी मूर्तियां पानी के भीतर रहकर भी जस की तस रह जाती है। जो नदी का पानी कम होने पर ऊपर दिखने लगती है। जिस वजह से मीडिया के द्वारा यह हल्ला मचाया जाता है कि नदी में से गणपति बप्पा निकले हैं। यह सुनकर रूढ़िवादी धर्मांदता से लबरेज लोगों का हुजूम नदी के तट पर पुल पुलिया पर खड़े होकर भगवान का प्रकट होना मान लेते हैं और पूजा पाठ का दौर शुरू कर दिया जाता है। इस तरह की अफवाह सुनकर लोग भागे-भागे नदी के पास पहुंचने लगते हैं। जिनको नियंत्रित करने के लिए पुलिस बल आ जाया आया करता है ताकि अति उत्साह की वजह से किसी भी तरह की जनहानि ना होने पाए। वेब मीडिया द्वारा इस तरह का माहौल बना दिया जाता है कि आमजन काम धाम छोड़कर नदी की तरफ दौड़ा जाता है। बाद में पोल खुलती है की नदी में विसर्जित मूर्ति कहीं से बह कर आई होगी।






