कोरोना माहमारी से पूरा ब्रह्मांड जूझ रहा है। ऐसे में लोकतंत्र के चारो स्तंभों की जिम्मेदारी होती है कि मिल बांटकर इस माहमारी का सामना कर देश को बचाया जा सके।परन्तु कुछ तलुआ चटटूओ की वजह से यह माहमारी अपने रौद्र रूप में आते जा रही है। ये वो लोग है जो गरीबो,पुलिस वालों को दी जाने वाली प्रत्येक सामग्रियों पर डाका डालते है। सब की बुराई करने वाले अपने समाज बिरादरी की बात आने पर गुमराह करने लग जाते है। लानत है ऐसे चोलाधारी मीडिया के लोगो पर जो महज पुलिस वालों,rpf वालो का दल्ला कहलाने को ही पत्रकारिता समझते है। मौका मिलने पर पुलिस के जूते को ही अपना प्रसाद समझते है।
40 दिनों से जो दृश्य सामने आया उसमे पुलिस की भूमिका ही सर्वोपरि दिखलाई दी जबकि यह कार्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के अतिरिक्त निगम प्रशासन, खाद्य विभाग के अधीन होना चाहिये। जहां पुलिस अधीक्षक, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक क्वारेंटाइन में रहते है तो chmo महज कभी न उठने वाले फोन पर निर्भर रहकर जिले को ग्रीन जोन में बतलाने पर तुले है।अरे सहाब जहां के डॉक्टर एक सामान्य खांसी,सर्दी,बुखार का इलाज नही कर पाते वे भला कोरोना के मरीजों की पहचान क्या खाक कर पाएंगे। यह बात अलग है कि कोरोना के नाम पर करोड़ो रूपये की हेराफेरी करने का मौका मिल गया। पुलिस प्रशासन यदि अपने हाथों को खड़ा कर दे तो हर वार्ड से कोरोना के संक्रमित मरीज मिलने से कोई नही रोक सकता।







