छत्तीसगढ़ शासन के नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग ने राज्य के स्थानीय निकायों में पारदर्शिता और महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए एक ऐतिहासिक और सख्त कदम उठाया है। अब नगर निगम, पालिका और पंचायत स्तर पर महिला जनप्रतिनिधियों के नाम पर उनके पतियों या अन्य पुरुष रिश्तेदारों द्वारा धौंस जमाने और सरकारी बैठकों में हस्तक्षेप करने वाले ‘पार्षद पति’ (Prashad Pati) सिस्टम पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है।
क्या है नया नियम?
राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना के अनुसार, छत्तीसगढ़ नगरपालिक निगम अधिनियम 1956 और छत्तीसगढ़ नगरपालिका अधिनियम 1961 के तहत नियमों में संशोधन किया गया है। नए प्रावधान के मुताबिक:
किसी भी नगरीय निकाय में निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधि ( पार्षद या अन्य पद ) के पति, पुत्र, पुत्री, भाई, बहन या किसी भी अन्य निकट पारिवारिक सदस्य को उनका परोक्ष प्रतिनिधि (Proxy Representative) या समन्वयक (Coordinator) के रूप में नामित या नियुक्त नहीं किया जाएगा।
अब बैठकों में या प्रशासनिक कार्यों में महिला सदस्यों की जगह उनके परिवार के पुरुष सदस्य शामिल होकर फैसले नहीं ले सकेंगे।
क्यों पड़ी इस नियम की जरूरत?
अक्सर यह देखने में आता था कि चुनाव महिलाएँ जीतती थीं, लेकिन सत्ता और फैसलों की असली कमान पर्दे के पीछे उनके पतियों या रिश्तेदारों के हाथ में होती थी। इसे लेकर लगातार शिकायतें मिल रही थीं कि महिलाएं सिर्फ कागजी प्रतिनिधि बनकर रह जाती हैं। इस नए संशोधन से अब महिला जनप्रतिनिधि स्वतंत्र रूप से अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर सकेंगी और जमीनी स्तर पर उनका वास्तविक नेतृत्व उभरकर सामने आएगा।
यह देखा जाता है कि केंद्र सरकार राज्य सरकार की योजनाओं एवं अति महत्वपूर्ण गोपनीय निर्णय लेते समय जनप्रतिनिधि की अपेक्षा उनके द्वारा थोपे गए लोगों के सामने सब जानकारी निकाल कर सामने आ जाती है। जिससे शासकीय कार्यों की पारदर्शियता खत्म हो जाती है। थोपे गए लोग जानकारियो को अपने, जान, पहचान ,रिश्तेदारों, दोस्त, यारों, को शेयर कर देते हैं। जिससे बहुत बड़े नुकसान होने की संभावनाये रहती है।







