रायगढ़——– देश के प्रमुख दानवीरों के नामो मे शुमार स्व.सेठ किरोड़ीमल जी ने सपने में भी नही सोचा होगा कि धार्मिक एवं सामाजिक दिशा में किये गये उनके कार्य किसी दिन अपनी पहचान के लिए भी तरस जायेंगे। स्व. सेठ किरोड़ीमल जी द्वारा सेवा भावना से ओत प्रोत होकर रायगढ़ शहर में स्कूल,कालेज,धर्मशाला, मंदिर,कालोनी आदि का निर्माण करवाया था। कालांतर में उनके ट्रस्टियों ने इन सबको बेचा ही है साथ ही उनके देखरेख के अभाव में जर्जर भी हो रहे है। किरोड़ीमल जी द्वारा निर्मित धरोहरों से उनका नाम भी विलोपित किया जा रहा है। अस्पताल का नाम बदल गया,नटवर स्कूल का नाम भी बदल जायेगा,पालीटेक्निक कालेज का नाम भी बदला जा सकता है,महिला चिकित्सालय को लोग रूपेन्द्र अस्पताल से जानने लगे है। सेवाकुंज अब नये सेठ की आफिस का पता बन चुका है। किरोड़ीमल जी की समाधि स्थल को नई पीढ़ी के लोग शायद ही जानते होंगे। दान्तव्य औषधालय अब खोज बन चुका है। स्व.सेठ किरोड़ीमल जी द्वारा निर्मित प्रत्येक भवन अपना मूल ठिकाना भूलकर जर्जर हो चुके है और बिकने के कगार पर है। रायगढ़ की शान बुजी भवन अब फर्नीचर का शोरूम बन चुका है। नेत्र चिकिसालय में उल्लू बोलने लगे है।

सत्तीगुड़ी चौक स्थित साफ सुथरा,सफेद रंग लिये भरतकूप कुंआ,शिवमंदिर पर इन दिनों किसी के द्वारा रंग रोगन करवाकर और बदरंग करवा दिया गया है। इस कुंए एवं मंदिर पर लिखे सेठ किरोड़ीमल जी के नाम पर सफेदी पोत दी है। जिससे यह संकेत मिल रहा है कि उक्त कुँए को पाटकर 8,10 दुकाने बनवाकर ऊंचे दामो पर बेचा जा सकता है।
इस कुँए के पास पेंटर का कार्य करने वाले संतु ने बतलाया कि भरतकूप में 108 कुओं के पानी सहित देश के चारो धाम से पानी लाकर डाला गया था। उक्त कुँए का पानी शुद्ध एवं पवित्र माना जाता था। सभी धार्मिक अनुष्ठानों में इस कुँए के पानी का उपयोग किया जाता था।आसपास के मोहल्लेवासी इस कुँए का पानी ही पिया करते थे कुँए से बाल्टी के सहारे रस्सियों से पानी खिंचने के लिए चार तरफ जंगरोधी घिररीयां लगी हुई थी। जो समय के साथ चोरी होकर कबाड़ियों के यहां शराब के एक पोव्वे के लिए बिक चुकी है। महिलाओं एवं बुजुर्गों के द्वारा पानी लेने के लिए एक हैंडपंप लगा हुआ था। जिसका पाइप कुँए में गहराई तक गया हुआ था ताकि बारहों महीने जल स्रोत बना रह सके एवं परेशानी भी न हो सके। इस कुँए का हैंडपंप खराब हुए दशक बीत गया एवं जगह जगह फरियाद करने का कोई असर नही हुआ। मंदिर पर किसी ने कब्जा कर लिया गया है। जो अपनी सुविधानुसार मंदिर में पूजा पाठ करने के लिए खोलता एवं बंद करता है। सावन के माह में भी मंदिर अनियमित समय मे खुलता है। शिवरात्रि में आसपास के शिवभक्तों द्वारा आपस मे चंदा आदि कर भंडारा लगाया जाता है।
शहर के लुप्त हो चुके मुंशी कुंआ, डेढ़राज कुआँ के बाद इस भरतकूप की महत्ता थी। सम्वत 2021 अर्थात सन 1964 मे इस कुँए की शुरुआत हुई थी। जिसे सेठ किरोड़ीमल जी ने भरत लाल जी की स्मृति में बनवाया था। इस कुँए के कारण आसपास क्षेत्र वासियो को कभी पानी की किल्लत नही हुई साथ ही यहां का पानी राहगीरों की प्यास बुझाने के काम आता था। कुँए के नीचे पशुओं को पानी पीने के लिए कोटने बनवाये गये थे। ताकि दोपायो के अतिरिक्त चौपाये भी प्यासे न रहे मगर अब ये भी किसी काम के नही रह गए।
इस कुँए में आज भी पानी भरा हुआ है मगर इस कुँए का सफेद चबूतरा शराबियों,गंजेडीयो के लिए आरक्षित हो चुका है। कोई पिनक में कुँए में न गिर जाए इस हेतु कुँए में लोहे की जाली लगा दी गई है परन्तु असमाजिक तत्व कुँए में कचरा,शराब की खाली बोतलें,डिस्पोजल गिलास,चखने के कागज फेकने में अपनी शान समझते है।
सुई दान कर अखबारों में छाये रहने वाले,मुंबई,कोलकाता से नचनिया बुलवाकर अपनी बांछे फैलाने वाले तथाकथित समाज सेवियों को चाहिए कि महज कुछ हजार ₹ खर्च कर इस कुँए की अंदुरिनि सफाई करवाकर एक हैंड पम्प लगवा दे ताकि उनके काले कारनामो पर पर्दा भी डल जाये।
सबसे दुखद पहलू यह है कि इस भरतकूप स्थित क्षेत्र में शहर के प्रबुद्ध एवं रशुखदार वर्ग निवास करते है। इस मार्ग से सभी आला अधिकारी एवं जनप्रतिनिधी वाहन से एक दिन में कई मर्तबा गुजरते है परन्तु इस ओर नजर उठाने की जरूरत नही समझते।






