रायगढ़—– पिछले दो दिनों से पत्रकार वर्सेस एस डी ओ पी सारंगढ गाली गुफ्तार का मामला हर किसी की जुबान पर है। जो कि आने वाले समय मे तूल पकड़ सकता है। बरहाल जितने मुंह उतनी बाते हो रही है। लोग इसे 2 पुलिस अधिकारियों के आपसी मतभेद, साजिश, षडयंत्र भी करार दे रहे है।
बतलाया जा रहा है कि सारंगढ में पुलिस के अनुविभागीय अधिकारी को नीचा दिखलाने की गहरी साजिश पत्रकार के माध्यम से रची गई थी। जो कि लगभग सफल रही। वहीं दूसरी तरफ यह कहा जा रहा है कि थाना प्रभारी के द्वारा पुलिस को मिल रही सफलता को अपने सर्विस रिकार्ड में दर्ज करवाने की मंशा में एस डी ओ पी आड़े आने से मंशा सफल नही हो पा रही है।
एक जिम्मेदार पुलिस अधिकारी इतना भी नासमझ नही है कि पत्रकार के कुर्सी पर बैठने पर आग बबूला होकर अश्लील गालियों की बौछार कर दे। यदि पत्रकार का मोबाईल पुलिस स्टाफ के पास रखवा दिया गया था तो सोशल मीडिया में वायरल हो रहा वीडियो किसने बनाया। इस दिशा में छानबीन करना अतिआवश्यक है।
पत्रकार के सम्बंध में भी कई बातें सामने आई है। सन 2010 के गड़े मुर्दे फिर से उखड़ने की संभावना बलवती हो गई है क्योंकि इस प्रकरण की जांच की जिम्मेदारी पुलिस अधीक्षक संतोष कुमार सिंह ने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अभिषेक वर्मा को सौप दी है। आगे शुरू होने वाली जांच में बहुत से खुलासे और बहुत से चेहरों के बेनकाब होने की संभावना है। ऊंट जिस करवट भी बैठेगा विवाद कम नही होगा। इसका सबसे अच्छा हल यह है कि पुलिस अधीक्षक त्रि पक्षीय वार्ता कर मामला सुलह करवा दें और सारंगढ थाने के पूरे स्टाफ का क्षेत्र बदल दे। पुलिस की विभागीय कलह सार्वजनिक होने से कोई अच्छा सन्देश नही दे रहा है। इस पूरे एपिसोड में सारंगढ के पत्रकारो में भी दो फाड़ देखी जा रही है। जिससे पत्रकारो की भी छवि खराब हो रही है। सच्चाई जो भी होगी वह भी कोई कम छीछालेदर भरी नही होगी। जनमानस तो चटकारे लेने में लगे हुए है। आरोप प्रत्यारोप का समय थम जाना बेहतर होगा।पुलिस प्रशासन एवं वास्तविक पत्रकारो का तो चोली-दामन सा साथ है जो कभी भी किसी भी षडयंत्र से अलग नही हो सकते।







