रायगढ़——-जिले पुलिस अधीक्षक संतोष कुमार सिंह के सख्त आदेश एवं अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अभिषेक वर्मा के निर्देश पर जिले के सभी थाना क्षेत्रों के प्रभारी अपने अपने थाना क्षेत्रों में अवैध शराब के ठिकानों पर लगातार दबिश देकर अवैध शराब जप्त कर आरोपियों को जेल निरुद्ध करवाने को संकल्पित हो चुके है। जबकि जिले के कई थानों में पुलिस अधीक्षक के आदेशों को एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाला जा रहा माना जा सकता है। शहर के भीतर अवैध शराब किस तरह से कई थानों से गुजर कर पहुंच रही है। यह अत्यंत ही गंभीर एवं सोचनीय विषय है। जबकि कई थाना क्षेत्रों की सीमा पड़ोसी राज्य ओड़िसा से जुड़ी हुई है। इसके बावजूद शहर के भीतर एवं आसपास की होटलो एवं ढाबो में ओड़िसा की अंग्रेजी एवं महुआ शराब का मिलना बेहद चिंतनीय है। हांलाकि इस तरह की अवैध शराब की तस्करी को आबकारी विभाग के द्वारा रोकने का प्रयास किया जाना चाहिए क्योंकि प्रदेश में शराब बेचने का कार्य सरकार के अधीन है। दीगर प्रांतो से तस्करी होकर बिकने वाली शराब से राज्य सरकार के राजस्व को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। निम्नांकित थाना के प्रभारी अपने कार्यालय में यदाकदा दर्शन मात्र देते है।जिसे की अहोभाग्य माना जा सकता है।
शराब तस्करी को रोकने के सारे प्रयास विफल डी जी डी एम अवस्थी के कड़े आदेश दिए जाने के बाद भी रायगढ़ पुलिस कोताही बरत रही है और नरमी बरतने के कारण ओड़िसा से लगातार महुआ एवं अंग्रेजी शराब की आवक दुगुनी चौगुनी रफ्तार से बढ़ रही है। आखिरकार कई थाना क्षेत्रों की सीमा को लांघकर शहर एवं होटलो तक कैसे सप्लाई जारी है जो कि बगैर तालमेल के संभव हो ही नही सकता। पुलिस की लचर एवं कमजोर पेट्रोलिंग के कारण मादक पदार्थों का धंधा उद्योग का रूप धारण कर लिया है। प्रत्येक अनुभाग में अनुविभागीय पुलिस अधिकारी के अतिरिक्त थानेदार,निरीक्षक, उप निरीक्षक,आरक्षक पदस्थ होने के बावजूद गाड़ियां भर भर शराब किस तरह से आ रही है। यह बात समझ से परे है। पुलिस कप्तान हर माह क्राइम मीटिंग में थाना प्रभारियों, अनुविभागीय अधिकारियों को चुस्त दुरुस्त रहकर अपराध पर नियंत्रण रखने के आदेश देते है परंतु उनके कानों पर मानो जूं भी नही रेंगती।
पुलिस के मुखबिर है जाने पहचाने चेहरे पुलिस के पास मुखबिर तंत्र की कमी नही है परंतु विडंबना है कि इन मुखबिरों के मधुर सम्बंध आरोपियों से होने के कारण पुलिसिया कार्रवाई की सूचना पहले से ही अपने आकाओं तक मोबाईल फोन के द्वारा देकर सचेत कर दिया जाता है। जिससे छापेमारी के बाद भी पुलिस के हाँथ आरोपियों के गिरेबां तक नही पहुंच पाते साथ ही इन मुखबिरों का लगातार थानों में आना जाना एवं थाना प्रभारियों के कक्ष में जमे रहना अपराधियो के द्वारा पहचान कर ली जाती है और मोटा नजराना देकर उनको अपने लिए मुखबिरी करने का जिम्मा सौप दिया जाता है।





