
रायगढ़—-कला एवं संस्कृति की नगरी में प्रत्येक दिन भाँति भाँति की संस्कृति देखने को मिल रही है। जिससे आमजनता एवं राजनीतिक गलियारों में अच्छा संदेश जाना नही माना जा सकता। अधिकारीयो का क्या है? आज यहां है तो कल कहीं और होंगे,परसों कहीं और होंगे। हो सकता है कि निगम आयुक्त की पदस्थापना किसी जिले के अतिरिक्त कलेक्टर के रूप में कर दी जाए या फिर इसी पद पर कहीं और तबादला कर दिया जाए परन्तु इससे आयुक्त को किसी किस्म का फर्क नही पड़ने वाला मगर सभापति जयंत के रशुख,पहुंच,शाख पर जरूर असर पड़ सकता है। मिली जानकारी के अनुसार अपने चहेतों को ठेके न मिलने से विचलित शांत,शालीन जयंत का आक्रमक रुख अपनाना जनचर्चा में कौतूहल का विषय बन गया है। शहर में शुरू किये जा रहे विकास के कार्यो में अड़ंगा,रुकावट डालने का कार्य कांग्रेसी पार्षद कर रहे और विपक्ष भाजपा के पदाधिकारी ए सी चेम्बरो में बैठकर केवल विज्ञप्ति बाण दागने में एवं जुबानी तीर ही चला रहे है। विकास कार्यो में रोड़ा अटकाना एक तरह से अपनी ही पार्टी का विरोध करना भी माना जा सकता है।
*दो धीर गंभीर, शांत एवं सुलझे दिमाग के लोगो के बीच आपसी हुज्जतबाजी होना कम आश्चर्य नही है* निगम कमिश्नर आशुतोष पांडेय मूलतः बनारस उत्तरप्रदेश के रहने वाले प्रशासनिक अधिकारी है। जो शहर को स्वच्छता रैंकिंग में अव्वल नम्बर दिलाने की खातिर अल सुबह मजबूत इरादे लिए अपने लक्ष्य पर जिला दंडाधिकारी भीम सिंह,महापौर जानकी काटजू ,निगम कर्मियों,चंद पार्षदों के साथ शहर को साफ सुंदर बनाने के खाका खींचने में लग जाते है। तंग गलियों,मणिकंचन केंद्रों,नाली,नालो की सफाई,अवैध निर्माण कार्यो में ऊर्जा खपाने के बाद दिनभर जन समस्याओं,निगम कर्मचारियों की समस्याओं में ही उलझे रहने,कम बोलने वाले आशुतोष हर समय गंभीर मुद्रा में रहते है। वहीं जयंत ठेठवार की गिनती शहर के कद्दावर कांग्रेसी नेताओं के रूप में होती है। पढ़े लिखे,वाकपटु जयंत का भी अचानक उत्तेजित हो जाना हर किसी की समझ से बाहर है। पुरानी बस्ती के अपराजित योद्धा जयंत के पास समर्थकों,चाहने वालो की कमी नही है। जयंत में राजनीतिक गुण के साथ एक कुशल व्यपारी के गुण भी है। मात्र टेंडर को लेकर इन दोनों के बीच तकरार होना ही कारण नही माना जा सकता।
*शहर में चल रहे विकास के कार्यो को ग्रहण न लग जाये कहीं* इस वर्ष से शहर का महानगर की तर्ज पर विकास कार्य किये जाने है ताकि आने वाले 10 वर्षों में शहरवासियों को किसी प्रकार की समस्या न हो। सड़क,बिजली,पानी,चिकित्सा, शिक्षा, आदि दर्जनों कार्यो से विकास की गंगा बहाई जाएगी परन्तु इस तरह से नेताओ और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच आपसी सामंजस्य नही बैठेगा तो अधिकारी वर्ग शहर के कार्यो से पल्ला झाड़ लेंगे अधिकारी आते रहेंगे,जाते रहेंगे तनख्वाह उनको मिलती रहेगी परन्तु वे दिलचस्पी न लेकर कार्य करने में कोताई बरतने लग जायेंगे। कमिश्नर के आह्वान पर निगम की सफाई,जल,नल,मल,राजस्व,शिक्षा,स्वास्थ्य आदि सभी की व्यवस्था डगमगा सकती है। आशुतोष का क्या नुकसान होना है। बद्रीनाथ,केदारनाथ, सोमनाथ,महाकाल, मल्लिकार्जुन, भीमाशंकर, त्रयम्बकेश्वर,बैधनाथ, विश्वनाथ, अमरनाथ,सोमनाथ तो एक ही रहेंगे। देवो के देव महादेव ही कहलायेंगे।
*आपसी तकरार का खामियाजा आम जनता को न भुगतना पड़ जाये* दो कद्दावर लोगो के बीच का मामला यदि तूल पकड़ लेगा तो उसका खामियाजा आम जनता को ही उठाना पड़ सकता है।इसलिए बेहतरी इसी में है कि दोनों को आपसी मतभेद भुलाकर शहर के मास्टर प्लान को अमलीजामा पहनाने की दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए। जिससे आने वाले समय मे जनता जनार्दन के दिलो में जगह बनाई जा सके।






