*टूटी कलम* रायगढ़—- वैसे तो शहर में दुर्घटनाजन्य चौको की कमी नही है। मगर उक्त चौकों पर यातायात जवानों की तैनाती न होने की वजह से अक्सर छोटी मोटी दुर्घटनाएं दिनभर घटती रहती है। सिकुड़ता शहर बढ़ता यातायात का दबाव से सब हलाकान है और उचित कार्यवाही न होने की वजह से लोग भी चुप्पी साधे हुए है।

यातायात में बल की कमी —- विकसित एवं औद्योगिक शहर होने के बावजूद पर्याप्त बल न होने की वजह से सही ढंग से न चालानी कार्यवाही हो पाती है और न ही यातायात नियंत्रित हो पाता है। शहर वासी भी गैर जिम्मेदार है जो अपने वाहन सड़को पर बेतरतीब तरीके से खड़े कर देते है। शहर में बनाये गये पार्किंग स्थल महज कागजो में बनकर रह गए है। वैसे तो यातायात विभाग में डी एस पी,थाना प्रभारी पदस्थ है परन्तु आरक्षको की कमी से विभाग को जूझना पड़ रहा है।

आ जाते है रशुखदारो के फोन—- सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जब भी यातायात विभाग चौक-चौराहों पर चलानी कार्यवाही करता है तब तीन सवारी,हेलमेट,नाबालिगों के वाहन चलाने पर कार्रवाई न करने के फोन घनघनाने लगते है। महज 100-200 रुपये की खातिर लोग अपने आकाओं को फोन कर गिड़गिड़ाते है तब रसूखदारों के फोन कार्रवाई न करने की खातिर आने लगते है ताकि उनका बाहुबल,वोट बैंक बना रह सके।

नगर सैनिकों की ली जानी चाहिए मदद—– बल की कमी से जूझ रहे यातायात विभाग को नगर सैनिकों की मदद लेनी चाहिये ताकि भाग निकलने वाले वाहन चालकों की घेराबंदी तगड़ी की जा सके। यदि पुरुष सैनिकों की कमी हो तो महिला होम गार्डों की भी सहायता ली जा सकती है। इनकी मदद लेने से नगर सैनिकों में भी कार्य के प्रति उत्साह बना रह सकेगा। दिनभर मोबाईल में व्यस्त रहकर दिन व्यतीत करने वाले नगर सैनिकों को भी अपने कर्तव्य का बोध हो सकेगा।
वाहनों के पार्किंग स्थलों को ठेके पर दे दिया जाना चाहिए—– शहर में निगम प्रशासन, पुलिस प्रशासन द्वारा चिन्हांकित किये गए पार्किंग स्थलों को ठेके पद्धति पर दे दिया जाना चाहिए ताकि सड़को पर यत्र तत्र बेतरबी से अपने वाहन खड़े करने वालो से रसीद काटने के माध्यम से सबक सिखला जा सकता है। लोग 10-20 रुपये बचाने की खातिर अपने वाहन निर्धारित स्थलों पर ही खड़े करने लग जायेंगे।
बुरा हाल है कोतरारोड़ का—-सबसे ज्यादा बुरा हाल कोतरारोड सड़क का है। जहाँ की सड़कें पर्याप्त चौड़ी होने के बावजूद लोगो द्वारा सुबह से देर रात तक अपने वाहन खड़े कर मार्ग को संकुचित कर दिया जाता है। बतलाया जा रहा है कि इस मार्ग पर संचालित डायग्नोस्टिक सेंटरों, डाक्टर की क्लीनिकों, कपड़ा व्यवसाईयों,हुक्काबार, होटल वालो ने नियम कानून को जूते की नोक पर रखा हुआ है। महज सड़क सुरक्षा सप्ताह के समय साल में एक बार कार्रवाई कर इन लोगो को पूरे साल मनमानी करने का मानो लाइसेंस प्रदान कर दिया जाता है। बकायदा इस मार्ग पर यातायात विभाग,पुलिस की पेट्रोलिग वाहने घूमती है। मगर क्या मजाल जो सड़क के बीच खड़े वाहनों पर कार्रवाई कर दे। बेचारे पुलिस वाले मन मनोसकर आंखे नीची कर इधर के मार्गो से गुजर जाते है।
दुर्घटनाओ का सबसे बड़ा कारण बाइकर्स,अव्यवस्थित डिवाइडर है—- अगर देखा सोचा समझा जाये तो दुर्घटनाओं का अहम कारण तेज रफ्तार बाइकर्स,नाबालिग वाहन चालक और शहर में अव्यवस्थित तरीके से बने डिवाइडर है। कलेक्ट्रेट मार्ग,चक्रधरनगर चौक मार्ग,कबीरचौक मार्ग,ढिमरापुर रोड़ आदि सभी मार्गो में बने डिवाईडर लोगो को प्रश्रय देने के अनुसार बना दिये गए है। 10-20 कदमो पर ही निर्माण न करना सबसे बड़ा दुर्घटनाओं का कारण है। वाहन चालक अचानक से छूटे हुए डिवाइडरों के बीच अपने वाहन मोड़ देते है। जिस कारण से पीछे या विपरीत दिशा से आ रहे लोगो से टक्कर हो जाती है। इन डिवाइडरों के खाली स्थानों को यदि बंद कर दिया जाए तो संभवतया दुर्घटनाओं में नियंत्रण लग सकता है।
दुनिया ने कहीं नही बने होंगे ऐसे रोड़ डिवाइडर ——- महानगरों,नेशनल हाइवे में भी इस तरह के डिवाइडर देखने को नही मिलेंगे। जहां लोगो को प्रश्रय देने के लिए बीच बीच मे स्थान नही छोड़े जाते है। लोगो को सड़क के दूसरी तरफ आने-जाने के लिए बहुत दूर,1 आध किलोमीटर तक का फेरा लगाना पड़ता है ताकि दुर्घटनाओ से जानमाल को बचाया जा सके। ऊपर लिखे चौक चौराहों पर ट्रैफिक सिग्नल,ब्लिंकर लगाने आज शहर की जरूरत बन चुके है। जिसे देर सबेर धरातल पर लाना ही होगा।




