रायगढ़—– शनै शनै पत्रकारिता अपना मकसद भूलकर पुलिस की मुखबिरी करने की ही पत्रकारिता बनकर रह गई है। जो काम पुलिस विभाग के लिए उनके खबरीलाल किया करते है वह काम अब पत्रकार कर रहे है। व्यक्तिगत द्वेष की खातिर कार्यवाही हेतु पुलिस पर दबाव बनाया जाने लगा है। यह हाल केवल रायगढ़ का ही नही अपितु पूरे देश,प्रदेश का हो गया है। 10-20 हजार रुपये खर्च करने पर पत्रकारिता करने का लाइसेंस मिल जाता है। पत्रकार बनने के लिए कोई नियम कानून,मापदंड न होने की वजह से अशिक्षित, अर्धशिक्षित युवा इस ओर तेजी से अग्रसर हो रहे है। जिसके उदाहरण रोज कई नये वेब पोर्टल देखे जा सकते है। जिसके माध्यम से उद्योगपतियों,अधिकारी वर्ग को परेशान करने का लाइसेंस मिल जाता है। सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते इन्हें कही भी कभी भी देखा जा सकता है। दीपावली,26 जनवरी,15 अगस्त के समय ही विज्ञापनों के लिए छपने वाले अखबारो की संख्या कई दर्जन हो जाने की वजह से अधिकारी भी अपने कार्यालयो से गायब रहते है। दिनभर विज्ञापनो के तगादे से त्रस्त अधिकारी वर्ग लुक छिप कर अपने दफ्तरों में रहते है।
वेब पोर्टल वालो ने नाक में दम कर दिया है——जितनी तरक्की टेक्नोलॉजी क्षेत्र ने की है। उतनी तरक्की किसी अन्य क्षेत्र ने नही की है परन्तु इस तरक्की का फायदा कम नुकसान ज्यादा हो रहा है। सरकार की कोई गाईड लाईन न होने की वजह से वेब पोर्टल बेरोजगारो की पहली पसंद बनता जा रहा है। कुछ रुपये खर्च कर आजीवन कमाई का जरिया बन रहा है वेब पोर्टल। कई अधिकारीयो ने नाम न छापने की शर्त पर बतलाया कि वेब पोर्टल वालो की धमक के कारण सरकारी कामकाज प्रभावित होते है। जिसका कारण दफ्तरों के चक्कर लगाते,कुर्सियों पर डेरा डाले वेब पोर्टल वाले है। जो मोबाईल का इस्तेमाल अस्त्र के रूप में करते है और छोटी छोटी बातों की रिकार्डिंग कर दुष्प्रचार तुरन्त वायरल कर देते है। 200-500 न मिलने तक ये लोग अपनी जगह से हिलते भी नहीं है। अधिकारियों ने बतलाया की कुछ अखबार एवं वेब पोर्टल वाले उनकी सहमति लिए बगैर विज्ञापन चला देते है और वसूली के लिए इस अंदाज से तगादा करने लगते है मानो उन्हें इस तरह के तत्वों से ब्याज पर रकम ले रखी है। 5000 रुपये का विज्ञापन का बिल बनाने वाले 500 रुपये मिल जाने पर अपनी शर्ट की कॉलर खड़ी कर बड़ी शान से दफ्तरों से बाहर निकलते है। जबकि वास्तविकता यह है कि वे अधिकारी उनकी पीठ के पीछे गालियां बकते है और बुराई करते है।
बड़े अखबारों,न्यूज चैनलों पर पड़ रहा है असर—— लोकल,यदाकदा निकलने वाले अखबारों एवं वेब पोर्टल वालो के कारणों से प्रदेश स्तरीय,जिला स्तरीय ख्यातिप्राप्त मीडिया को काफी फर्क पड़ रहा है। अल सुबह पढ़ी जाने वाली खबरे एक दिन पहले ही प्रसारित हो जाती है। जिस वजह से सब खबरे बासी कहलाती है। बड़े अखबारों में हजारों रुपये में छपने वाले विज्ञापनो को 500-1000 रुपये में ही 4 बार छाप दिया जाता है।
स्थानीय समस्याएं हुई नदारद—-पैसे कमाने की हवस से स्थानीय मुद्दों पर प्रशासन, सरकार,जनप्रतिनिधियों को अवगत करवाने वाले समाचार विलुप्त से हो रहे है। सड़क,बिजली,पानी,शिक्षा, चिकित्सा,प्रदूषण पर किसी का ध्यानाकर्षण नही करवाया जाता। बिगड़ी यातायात व्यवस्था, नाले नालियों पर अतिक्रमण,फ्लाईएश की गैर जिम्मेदारना तरीके से डंपिंग पर से मीडिया आंखे चुराने लग गई है। गरीबो के हितों के लिए लड़ने वाली लड़ाई बंद कर दी गई है।
विज्ञापन का खेला जाता है खेल—-सच तो यह है कि वेब पोर्टलों द्वारा शासकीय अधिकारियों,व्यापारियों,उद्योगपतियो,जनप्रतिनिधियों से विज्ञापन लगाने के नाम पर अवैध तरीको से धन उगाही की जाती है। जबकि हकीकत में विज्ञापनो का महत्व प्रिंट मीडिया में ही दिखलाई पड़ता है। जिसे हजारों लोग देखते पढ़ते है। इलेक्ट्रॉनिक एवं वेब पोर्टल के विज्ञापनो को केवल सम्बंधित व्यक्ति ही देख पाता है।
दी जाती है धमकी चमकी—— ऐसे वेब पोर्टल वाले बकायदा गुप्त रूप से वीडियो बनाकर सम्बन्धितों पर धन देने के लिए दबाव डालते है और धन न मिलने पर वीडियो वायरल कर देने की धमकी चमकी भी देते है। जबकि वास्तविकता कुछ और ही होती है। इस तरह के वीडियो समाचारों को प्रिंट मीडिया में तवज्जो नही दी जाती है।कुछ डरपोक किस्म के लोग ऐसे लोगो की धमकी चमकियो में आकर अपना गिरेबाँ,नोकरी बचाने की खातिर चंगुल में आ जाते है। जिससे तथाकथितो को बल मिल जाता है और वे दुगुने उत्साह से अवैध उगाही करने में भीड़ जाते है।





