*”मौन सर्वोत्तम जप है।,”शान्ति चाहिये तो माँ की शरण ले।”*- परम पूज्य श्री अघोरेश्वर महाप्रभु जी
*मानव सेवा,राष्ट्र कल्याण, और मां गुरु की शक्ति आराधना के केंद्र है अघोर आश्रम बनोरा।*
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नवरात्रि,पवित्र आचरण, आदर्श चरित्र और शक्ति संग्रह करने का पुण्यपर्व है । हर मनुष्य को अपने जीवन को उज्ज्वल बनाने,सुख, समृद्धि और शांति पूर्ण जीने हेतु शक्ति की उपासना आराधना अवश्य करनी चाहिए। आदिस्वरूप शिव भी शक्ति में ही निहित हैं। शक्ति के बिना शिव भी शव समान हैं। यह एक धार्मिक मान्यता है. शिव और शक्ति एक-दूसरे से अभिन्न हैं। शक्ति ही सर्वोपरि है ।शक्ति ही पूरे ब्रह्मांड को बनाती है। शक्ति ही सर्वोच्च बुद्धिमान और असीम रूप से विविधतापूर्ण है। शक्ति ही ब्रह्मांड को बनाने वाली ऊर्जाओं के पूर्ण स्त्रोत का प्रतिनिधित्व करती है। शिव-शक्ति की संयुक्त कृपा प्राप्त होती हैं।
परम पूज्य श्री अघोरेश्वर महाप्रभु के अनुशासित, सुयोग्य प्रियशिष्य औघड़ संत पूज्य बाबा प्रियदर्शी राम जी अपने पूज्य गुरुदेव की वाणी पर सदैव जोर देते हैं। *”मौन सर्वोत्तम जप है।शान्ति चाहिये तो माँ की शरण ले।सर्वेश्वरी ही एक शक्ति है जिसका अस्तित्व* *कण-कण में है।”*
*संसार की कर्मशाला में शक्ति से परे कुछ नहीं। विश्व का प्रत्येक कार्यशक्ति द्वारा ही होता है। जिसे शक्ति ने मान्य दिया, आदर दिया, सम्मान दिया, वह शक्तिमान हो गया, वह श्रीवान् (श्रीमान्) हो गया और जिससे उसने अपनी छाया हटा लिया और जिससे वह छाया हट गया, वह बिल्कुल निष्कलंक रहते हुए भी कलंकित हो जाता है। उस पर हरेक तरह का, हजारों अपराध की जुल्में लोग ढहाते रहते हैं।शक्ति का आदि रूप सर्वेश्वरी है, जिसकी कृपा से सभी कुछ सुलभ है।”*
प्रत्येक प्राणी के लिये आवश्यक है कि वह अपने में शक्ति के संचय का अभ्यास करे। चराचर में सभी प्राणी शक्ति के प्रतीक हैं। पूज्य बाबा जी नवरात्रि अनुष्ठान को बहुत महत्व देते हैं ।परम पूज्य बाबा प्रियदर्शी राम जी सदचरित्र,आदर्श आचरण, आत्मा की पवित्रता और मानवसेवा के साथ राष्ट्र कल्याण का संदेश देते हुए नवरात्रि अनुष्ठान पर मौन साधना व्रत धारण कर शक्ति की आराधना में लीन रहते हैं। अघोर आश्रम बनोरा और उसकी सभी शाखाएं ( आश्रम ) मानवता की सेवा, राष्ट्र कल्याण, और मां गुरु की शक्ति आराधना के केंद्र के रूप में पूरी श्रद्धा, भक्ति ,आदर्श और प्रेरणा का प्रतीक बन चुका है।
अघोर अर्थात जो घोर नहीं है, कठिन नहीं है, जिसमें घृणा नहीं है,जो बहुत ही सहज और सरल है। अघोर कोई पंथ भी नहीं है, अघोर एक पथ है ,पद है। अघोर पथ में गुरु का स्थान सर्वोच्च होता है। गुरु निष्ठ हो उनके मार्गदर्शन पर चलकर प्रत्येक व्यक्ति तपस्या साधना अभ्यास से इस उच्च आदर्श को प्राप्त कर सकता है। आदर्श चरित्र, आचरण और आत्मा की पवित्रता ही मूल आधार है।इसके बिना कुछ भी संभव नहीं है। हम ईश्वर के चरित्र की पूजा करते हैं। परम पूज्य श्री अघोरेश्वर महाप्रभु जी आशीर्वचनों के माध्यम से सदैव संदेश देते थे कि – *”मानवता ही धर्म है। तू कुछ मत बन सिर्फ मनुष्य बन जा।जब मनुष्य से मनुष्य ही नहीं खुश है तो देवता क्या खुश होगा।”*
“नवरात्र का पर्व चल रहा है,भक्ति के प्रति आस्था रखें और शक्ति के प्रति भी आस्था रखें। क्योंकि बिना भक्ति के शक्ति न होगी और बिना शक्ति के भक्ति भी नहीं होगी।नवरात्र के पवित्र पर्व के रूप में बहुत बलशाली बल बुद्धि और विवेक को देने वाला है और यह समय हम लोगों को प्राप्त है, इस समय में यदि निश्छल, निष्कपट तथा निर्विकार होकर जप इत्यादिक करते हैं तो निश्चय ही सफलता प्राप्त होती है। जय मां, जय गुरुदेव, जय अघोरेश्वर, मां सर्वेश्वरी त्वं पाहिमाम शरणागतम।
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