रायगढ़—– बहुत बड़ी खबर का खुलासा हो रहा है कि किसी समय जल,जंगल,जमीन प्राकृतिक सौंदर्य से आच्छादित रायगढ़ शांत एवं आपसी भाईचारे, सांस्कृतिक कारणों से जाना पहचाना जाता था। रायगढ़ घराने की नृत्यकला का डंका आज भी बज रहा है। कोसा कीड़ो के धागे से बने वस्त्रों की मांग विदेशों तक थी। रायगढ़ के पान के आगे बनारस का पान भी बेस्वाद महसूस होता था। रामझरना,टीपाखोल,लाखा पिकनिक स्पॉट हुआ करते थे। जो अब प्रदूषण एवं देखरेख के अभाव मे जीर्णशीर्ण होकर अपनी व्यथा पर आंसू बहा रहे है। बारह माह गुलजार रहने वाले खासकर आंवला नवमी पर भीड़ समेटने वाले उक्त स्थल अब जुआरी,शराबी,प्रेमी के लिए महफूज स्थान बन गये है।
जहां विकास है,वहां विनाश भी तय है परन्तु एक सीमा तक तो विनाश सहनीय है परन्तु पानी सर पर से गुजरने के पश्चात विद्रोह की चिंगारी भी संभव है। शहर की शांतप्रिय जनता आखिर कब तक सहनशीलता का प्रमाण देती रहेगी। जिस रोज जन आक्रोश आंदोलन में तब्दील हो जायेगा। उस दिन कई कम्पनी वालो को अपना बोरिया बिस्तर समेटना पड़ सकता है। बाहर से आये लोग यहां आसानी से उद्योग लगाकर गरीब आदिवासियों का शोषण तो कर ही रहे है साथ ही सरकारी नियम कानूनों को भी चांदी के जूतों की नोकपर रखकर जनमानस के स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर प्रकृति को भी नुकसान पंहुचा रहे है।
इन सब मामलों में 25/11/20 को तराईमाल के बंजारी मे एक कदम और आगे बढ़ाने का प्रयास जनसुनवाई के नाम पर पर्यावरण विभाग कर चुका है। जिसमे पैदा होने वाले नए उद्योग “अजय इंगार्ड” के करिन्दे या बिकाऊ लोगो को ही शामिल किये जाने की सुगबुगाहट है। इसे जनसुनवाई न कह कर कम्पनी मालिको की जी हुजूरी बजाना कहा जा सकता है।
जहां नये उद्योग लगाने की अनुमति दी जानी है। वहां के आसपास के गांवों के ग्रामीणों की जनसंख्या ही हजारों है तो पर भी पर्यावरण विभाग के द्वारा 100 लोगो को ही शामिल करने की अनुमति देना सोची समझी साजिश ही हो सकती है। जनसुनाई पर पहुंचने वाले उद्योग के विरोध में कुछ नही बोलेंगे क्योंकि “लिफाफे” पहले ही पहुंचाए जा चुके होंगे।
पर्यावरण विभाग के अधिकारियो,कर्मचारियों को तो यहां रहना भी नही है। अप्रैल माह के बाद रायपुर कूच कर जाना है। जाने से पहले ब्रीफकेस मे मोटी रकम को भर लेना है। रायगढ़ शहर के लोग प्रदूषण की मार सहकर टी बी, अस्थमा,खाज,खुजली,आंखों के रोगों से ग्रसित हो,टूटी फूटी, गढ्ढो की सड़कों पर चले,मौत का वारंट लेकर दौड़ने वाले वाहनों में इजाफा हो इससे किसी भी परदेशी अधिकारियो को कोई सरोकार नही है। उनके बच्चे नामचीन स्कूल,कालेजो में पढ़े,घरवाली सोने,हीरे के जेवरों से लदी रहे,आलीशान बंगला,लक्जरी वाहने,मोटा बैंक बैलेंस,जमीन,जायदाद रहे यही इन लोगो का मकसद रहता है। “अपना का घटता,भाड़ में जाये जनता” उद्योग के नाम पर जिला “हिरोशिमा” “नागासाकी” बन जाये। जहां की जमीन पर सैकड़ो साल तक कुछ नही उगने वाला और आने वाली पीढ़ी भी पूर्ण विकसित न हो। इस तरह भविष्य की चिंता करने की जहमत कोई क्यो उठाये।









